शिक्षा के अनुरूप हो रोजगार
 इलमा अज़ीम 
बढ़ती आबादी तथा रोजगारपरक शिक्षा के अभाव में देश में रोजगार के अवसर कम हुए हैं। अब यहां तक कहा जाने लगा है कि अब केवल शिक्षा ही रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। एक रिपोर्ट बताती है कि देश में चालीस प्रतिशत युवा स्नातकों को बेरोजगार रहना पड़ता है। साथ ही उनमें से केवल सात फीसदी को ही एक वर्ष के भीतर स्थिर वेतन वाली नौकरियां मिल पाती हैं। 

निस्संदेह, हाल ही में सामने आए ये आंकड़े देश में रोजगार सृजन और उच्च शिक्षा तक पहुंच के बीच के असंतुलन को ही उजागर करते हैं। अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष करीब पचास लाख स्नातक देश के कार्यबल में प्रवेश करते हैं। लेकिन उनमें से मुश्किल से आधे ही रोजगार पा सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें कम सुरक्षित व कम वेतन वाली नौकरियां ही मिलती हैं।
 
निश्चय ही दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले देश के लिये यह सुखद संकेत नहीं कहा सकता है। अन्य शब्दों में कहें तो स्नातक होने और रोजगार के अवसरों के बीच व्याप्त असंतुलन बढ़ रहा है। निर्विवाद रूप से यदि भविष्य में पर्याप्त और लाभकारी रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए जाते हैं तो देश में बेरोजगारी बढ़ने से युवाओं के कुंठित होने का खतरा पैदा हो सकता है। 

वहीं दूसरी ओर भारतीय रोजगार परिदृश्य पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं कि देश को शिक्षित युवाओं में लगातार बढ़ती निराशा, स्थिर आय और धीमी आर्थिक गतिशीलता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। वास्तव में यहां प्रश्न केवल संख्या का ही नहीं है वरन यह रोजगार की गुणवत्ता का भी सवाल है। 

देश में कई स्नातक ऐसे संस्थानों से निकलते हैं, जो शिक्षकों की कमी, पुराने पाठ्यक्रम और कमजोर उद्योग संबंधों जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि डिग्री की संख्या रोजगार बाजार में मांग की संख्या के अनुपात में कहीं अधिक है। यह भी हकीकत है कि मौजूदा परिदृश्य में देश को नामांकन बढ़ाने की प्राथमिकता से हटकर रोजगार क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। 



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