किसानों और कृषि के सामने मानसून का जोखिम

- डा.जयंतीलाल भंडारी
हाल ही में विश्व बैंक ने कहा है कि वर्ष 2026 में कमजोर मानसून से भारत में कृषि की पैदावार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने और विकास दर में कमी की चुनौती होगी। भारतीय मौसम विभाग ने अल नीनो के कारण 2026 में सामान्य से कम मॉनसून का अनुमान लगाया है। यह पूर्वानुमान पिछले 26 वर्षों में मानसून का सबसे कम शुरुआती अनुमान है। इससे देश में कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है। मौसम विभाग ने बारिश के दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के 92 प्रतिशत रहने की संभावना बताई है। यह पूर्वानुमान 5 फीसदी अधिक या कम की मॉडल त्रुटि के साथ जारी किया गया है। स्काईमेट की रिपोर्ट के अनुसार देश में 75 प्रतिशत वर्षा पर आधारित मॉनसून सीजन में 5 प्रतिशत कम-ज्यादा के साथ 94 प्रतिशत वर्षा हो सकती है।

पिछले आंकड़े बताते हैं कि सामान्य से कम मॉनसून वाले वर्षों में जब बारिश का समय, वितरण और फैलाव लगभग समान रहा तब खरीफ के उत्पादन में अधिक कमी नहीं हुई किन्तु गैर-सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाने वाली दलहन-तिलहन फसलों के लिए जोखिम हो सकती हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष से महंगे उर्वरक, महंगे तेल और आपूर्ति शृंखला बाधित होने से खेती की लागत बड़ी है, तब कमजोर मानसून से न केवल कृषि, वरन अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर हो सकता है। पेयजल समस्या बढ़ सकती है।
नीति आयोग के मुताबिक देश के कुल फसल रकबे का केवल 55 फीसदी सिंचित है और 45 प्रतिशत खेती मॉनसून पर निर्भर है। सीडब्ल्यूएमआई के अनुसार, लगभग 74 प्रतिशत गेहूं और 65 प्रतिशत चावल की खेती वाले क्षेत्र पहले से ही भारी जल-संकट का सामना कर रहे हैं। व्यावसायिक फसलों और औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ते रुझान से भारत में मॉनसून की वर्षा पर निर्भरता बढ़ी है। अब अल-नीनो के खतरे और कमजोर मॉनसून की आशंका से जलाशय के सूखने और खेती के लिए पानी की कमी की चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय जल आयोग देश में कुल 183.565 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) क्षमता वाले 166 प्रमुख जलाशयों के भंडारण पर नजर रखता है। इस समय इन जलाशयों में कुल क्षमता का 44.71 प्रतिशत है। हाल में इसमें तेजी से कमी आई है।
वर्ष 2024-25 में भारत में 35.70 करोड़ टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। इस वर्ष 2025-26 में इससे भी अधिक खाद्यान्न उत्पादन की संभावना है। 2026 में गेहूं की खेती का रकबा भी पिछले वर्ष के 328.04 लाख हेक्टेयर की तुलना में बढ़कर लगभग 334.17 लाख हेक्टेयर हो गया है। ये एक और अच्छी फसल की संभावना का संकेत देता है। एफसीआई के पास केंद्रीय पूल में एक अप्रैल 2026 को लगभग गेहूं और चावल का 600 लाख टन से अधिक का उपलब्ध स्टॉक खाद्य सुरक्षा के मामले में भारत की मजबूती है। इस समय देश के 80 करोड़ से अधिक कमजोर वर्ग के लोगों को नि:शुल्क खाद्यान्न वितरित किया जा रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि हाल ही में प्रकाशित निर्यात आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 55 अरब डॉलर मूल्य का कृषि निर्यात किया है और भारत दुनिया का 7वां सबसे बड़ा कृषि निर्यात के लिए देश के कृषि निर्यात परिदृश्य पर यह उभकर दिखाई दे रहा है कि वर्ष 2014 से 2025 के बीच प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों का निर्यात चार गुना, फलों और दालों का निर्यात तीन गुना, खाद्यान्न का निर्यात दो गुना और चावल के निर्यात में करीब 62 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

भारत सरकार ने घरेलू बाजारों को स्थिर करने और उत्पादकों को लाभकारी प्रतिफल सुनिश्चित करने के लिए एक निर्णायक और किसान-केंद्रित कदम उठाते हुए 50 लाख मीट्रिक टन गेहूं और अतिरिक्त 10 लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को मंजूरी दे दी है। लेकिन कमजोर मानसून के चलते आगामी निर्यात आदेशों की पूर्ति के लिए सजगता रखी जाए। देश ने देखा है कि वर्ष 2021-22 में 70 लाख टन से अधिक गेहूं का निर्यात किया था, लेकिन वर्ष 2024 में गेहूं का आयात करना पड़ा। निस्संदेह, कम बारिश से जलाशयों में पानी का स्तर गिरने से सिंचाई और पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी, ऐसे में अभी से जल संरक्षण के प्रयास शुरू होने चाहिए। इस समय जो खुदरा महंगाई दर 3.40 प्रतिशत है, उसके बढ़ने की आशंका होगी। अतएव मूल्यों की रोकथाम की रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

भारत को फसल विविधीकरण और खेती में आधुनिक तकनीक के एकीकरण के साथ आगे बढ़ना होगा। सिंचाई व्यवस्था की नई नीति तैयार करना लाभप्रद होगी। अनाज बर्बाद होने से बचाने के लिए देश में वर्ष 2028 तक सहकारी क्षेत्र में 700 लाख टन अनाज भंडारण की नई क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जाना होगा।

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