विकास की दौड़ में बुजुर्ग
इलमा अज़ीम
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की विशाल युवा आबादी देश की सबसे बड़ी आर्थिक पूंजी है और शिक्षा, कौशल विकास, तकनीकी उन्नयन तथा आधुनिक बुनियादी ढांचे में निवेश से तेज आर्थिक वृद्धि और बेहतर रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं। लेकिन इसी भारत में एक और भारत भी बसता है, जो अक्सर नीति विमर्शों और बजटीय प्राथमिकताओं से बाहर रह जाता है। यह भारत है बुजुर्गों का, जिनकी संख्या आज 14.9 करोड़ से अधिक है, जो यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
2022 के आंकड़ों के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 10.5 प्रतिशत हैं और पिछले दो दशकों में यह वर्ग तेज़ी से बढ़ा है। इसके बावजूद, बुजुर्गों की चिंताएं और उनकी आर्थिक-सामाजिक वास्तविकताएं नीतिगत बहसों में लगभग अदृश्य बनी हुई हैं। भारत की वृद्ध आबादी की दो सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं - ग्रामीणकरण और नारीकरण। देश के 71 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बेहद संकुचित है। भारतीय अर्थव्यवस्था में 90 प्रतिशत से अधिक कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जहां पेंशन और सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती। नतीजतन, वृद्धावस्था अक्सर आर्थिक असुरक्षा और दरिद्रता का पर्याय बन जाती है। हालांकि सरकारी आंकड़ों में 15 से 59 वर्ष की आयु को कार्यशील आयु माना जाता है, वास्तविकता यह है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग आज भी काम कर रहे हैं।
पेंशन कवरेज बेहद कम होने के कारण, गिरते स्वास्थ्य और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्हें आजीविका के लिए श्रम करना पड़ता है। यह तथ्य उस धारणा को चुनौती देता है कि बुजुर्ग केवल आश्रित होते हैं। आर्थिक योगदान के अलावा, बुजुर्गों की भूमिका सामाजिक पुनरुत्पादन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
विशेषकर बुजुर्ग महिलाएं अपने पोते-पोतियों की देखभाल, परिवार के अन्य सदस्यों की सेवा, खाना पकाने, सफाई, ईंधन इकट्ठा करने और रसोई बगीचों के रखरखाव जैसे कार्यों में कई घंटे खर्च करती हैं। यह अवैतनिक देखभाल कार्य औपचारिक अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा देता है और कार्यशील आयु के सदस्यों को बाजार में भाग लेने में सक्षम बनाता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के बुजुर्ग आर्थिक विकास में सक्रिय योगदानकर्ता हैं, न कि केवल बोझ। इसके बावजूद, भारत में बुजुर्गों के लिए सरकारी सामाजिक सुरक्षा का दायरा अत्यंत सीमित है। ‘विकसित भारत’ का सपना तभी साकार हो सकता है जब वह केवल युवा और कार्यशील वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि एक ‘सभी आयु वर्गों के लिए समाज’ का निर्माण करे, जहां हर नागरिक को गरिमापूर्ण, स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने का अवसर मिले। इसके लिए जरूरी है कि बुजुर्गों को विकास प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर दिया जाए और वे उसके लाभार्थी भी बनें।





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