इस्लामाबाद का कूटनीतिक स्वांग और भारत का मौन प्रहार

सपना सी.पी. साहू स्वप्निल

अमेरिका, इजराइल और ईरान के चालीस दिनों तक चले युद्ध के बाद दो सप्ताह के युद्धविराम के बीच, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर मध्यस्थता की भूमिका निभाना किसी भी राष्ट्र के लिए गौरव का विषय हो सकता है, लेकिन उससे पहले वह देश खुद की वैश्विक साख, विश्वसनीयता और तटस्थता को सही सिद्ध कर सके। हाल ही में इस्लामाबाद में अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच शांति स्थापित करने का जो बड़ा स्वांग पाकिस्तान ने रचा, उसका पटाक्षेप उम्मीद के विपरीत पूर्ण विफलता के साथ हुआ। 

11 अप्रैल 2026 को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच चली 21 घंटे की लगातार और सघन वार्ता ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल मेज सजाने से दिल नहीं मिलते और न ही दशकों पुराने जटिल भू-राजनीतिक संघर्षों का समाधान इतना आसान होता है। इस शांति वार्ता की विफलता ने न केवल पाकिस्तान की कूटनीतिक सीमाओं को दुनिया के सामने पूर्ण नग्न कर दिया, बल्कि भारत की मौन कूटनीति की उस दूरदर्शिता को भी प्रमाणित कर दिया है, जिसे भारत का राजनैतिक विपक्ष, वामपंथी विचारक और एक खास वर्ग सक्रियता की कमी का नाम दे रहा था।

इसके विफल होने के पीछे का कारण गहरे अविश्वास और कठोर शर्तों की एक लंबी सूची थी। अमेरिकी पक्ष की ओर से जे.डी. वांस का यह बयान कि ईरान उनकी न्यूनतम शर्तों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि निकट भविष्य में पश्चिम एशिया में युद्धविराम की संभावनाएं अत्यंत धूमिल हैं और आगे विभत्स युद्ध है। अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह फ्रीज करने और बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी जो शर्तें रखीं, वे किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए अस्वीकार्य थीं। दूसरी ओर, ईरान ने अपनी शर्तों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पूर्ण संप्रभुता और पिछले वर्षों में हुए आर्थिक नुकसान के लिए भारी मुआवजे की मांग करकर यह जता दिया कि वे महाशक्ति अमेरिका के दबाव और इजराइल की सटीक मारक क्षमता में भी अपनी शर्ते नहीं बदलेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में जो पाकिस्तान मध्यस्थता करवाने का दावा कर रहा था उसकी हैसियत एक नुमाइंदे डाकिए या महज मेजबान से अधिक नजर नहीं आई। इसका कारण तो सभी जानते है कि प्रभावी मध्यस्थता के लिए जिस वैश्विक दबाव, आर्थिक सुदृढ़ता और नैतिक शक्ति की आवश्यकता होती है, वह वर्तमान पाकिस्तान से कोसों दूर है।

दूसरा इसी बीच, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपरिपक्वता दिखाते हुए एक अत्यंत अमर्यादित और विवादास्पद ट्वीट किया। जो आग में घी डालने का काम कर गया। जब शांति वार्ता के लिए दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी थीं, तब पाकिस्तानी रक्षामंत्री ने इजराइल को मानवता के लिए कैंसर और अभिशाप कहना न केवल कूटनीतिक शिष्टाचार का घोर उल्लंघन था, बल्कि इसने पाकिस्तान के इस्लामी पक्षपाती चेहरे को भी उजागर कर दिया। किसी भी मध्यस्थ का प्राथमिक गुण तटस्थता होती है, लेकिन पाकिस्तान ने दुनिया के सामने साबित कर दिया कि वह एक पक्ष की विचारधारा से ग्रस्त है। इस बयान पर इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तीखी प्रतिक्रिया और पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल उठाना पूरी तरह तर्कसंगत है। भले ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद वह ट्वीट हटा भी लिया गया हो, लेकिन इससे पाकिस्तान की कूटनीति की वैश्विक मंच पर जो किरकिरी होनी थी, वह हो चुकी है। इसने दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया कि पाकिस्तान के शांति दूत बनने की मंशा केवल ढोंग है और ऐसा करवा पाना उसकी क्षमता से बाहर है।

विडंबना यह रही कि भारत के भीतर भी कुछ विपक्षी चेहरे, जिनमें सुप्रिया श्रीनेत, मेहबूबा मुफ्ती, जयराम रमेश, तारीक हमीद कर्रा और कुछ विशिष्ट विचारधारा वाले नेताओं ने तो पाकिस्तान की इस तथाकथित सक्रियता में पहले ही कसीदे पढ़ दिए, और इन नेताओं ने पाकिस्तान की इस डाकिए वाली भूमिका को भारत की कूटनीति के लिए शर्मनाक और पिछड़ने वाला तक बताया। लेकिन वास्तविकता में ऐसे नेताओं ने कूटनीतिक शोर-शराबे और फोटो ऑप्स को वास्तविक प्रभाव मान लेने की भारी भूल कर दी। भारत ने इस पूरे प्रकरण में जो रणनीतिक चुप्पी साधे रखी, वह दरअसल एक अत्यंत सोची-समझी सामरिक योजना थी। भारतीय विदेश मंत्रालय भली-भांति जानता है कि बिना किसी ठोस आधार, समान शर्तों और दोनों पक्षों के वास्तविक इरादों के बिना हुई कोई भी मध्यस्थता केवल एक अल्पकालिक मीडिया इवेंट बनकर रह जाएगी।

भारत की इस चुप्पी की कूटनीति ने देश को कई मोर्चों पर लाभान्वित किया है। हमने न तो किसी पक्ष को अनावश्यक रूप से उकसाया और न ही वैश्विक संघर्षों में अपनी सामरिक ऊर्जा और संसाधनों को व्यर्थ किया। इससे अमेरिका और इजराइल जैसे हमारे प्रमुख सामरिक सहयोगियों के साथ हमारे रक्षा संबंध अटूट रहे, जबकि दूसरी ओर ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े हमारे पारंपरिक रिश्तों पर भी कोई आंच नहीं आई। यह रणनीतिक संयम भारत को एक परिपक्व, स्थिर और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है जो केवल सुर्खियों के लिए कदम नहीं उठाता। पाकिस्तान की विफलता ने खुद-ब-खुद यह सिद्ध कर दिया है कि बिना वास्तविक आर्थिक प्रभाव, रक्षा शक्ति और निष्पक्षता से की गई मध्यस्थता केवल एक छलावा और समय की बर्बादी होती है।



इस्लामाबाद की विफल शांति वार्ता उन लोगों के लिए भी कड़ा सबक है जो वैश्विक कूटनीति को केवल अखबारों की सुर्खियों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स तक सीमित समझते हैं। पाकिस्तान की इस कोशिश ने उसकी कूटनीतिक खोखलेपन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी गिरती साख को ही उजागर किया है। वहीं, भारत का संतुलित, धैर्यपूर्ण और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने वाला दृष्टिकोण यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जटिल दौर में कभी-कभी मौन सबसे अधिक मुखर और प्रभावी हथियार होता है। भारत का यही रणनीतिक संयम उसे आने वाले समय में एक वास्तविक और निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

 इंदौर स्वरचित, मौलिक व  आलेख

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