चुनाव आयोग ने बदला नियम: अब आचार संहिता उल्लंघन पर सीधे दर्ज होगा मुकदमा

आयोग ने नोटिस भेजने के झंझट को किया खत्म, सलाखों के पीछे पहुँचेंगे नेता

चुनाव आयोग ने बदला नियम: अब आचार संहिता उल्लंघन पर सीधे दर्ज होगा मुकदमा 

नई दिल्ली। भारतीय निर्वाचन आयोग ने चुनावी शुचिता बनाए रखने के लिए दशकों पुराने 'नोटिस कल्चर' को खत्म करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग ने आदर्श आचार संहिता के नियमों में आमूलचूल बदलाव करते हुए अब उल्लंघनकर्ताओं को नोटिस जारी करने के बजाय सीधे एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कराने का आदेश दिया है। आयोग का मानना है कि नोटिस और चेतावनी की लंबी प्रक्रिया में चुनावी समय बर्बाद होता है और आरोपी बच निकलते हैं।

आयोग के अनुसार, वर्तमान में चुनाव कम चरणों और सीमित समय में संपन्न होते हैं। नोटिस जारी करना, जवाब मांगना और फिर फैसला सुनाना एक लंबी कानूनी प्रक्रिया है, जिसका फायदा उठाकर नेता चुनाव प्रचार के दौरान अपना एजेंडा चला लेते हैं। आयोग का मानना है कि नोटिस की जगह एफआईआर से कानूनी सख्ती तुरंत प्रभावी होती है। वहीं 'लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम' के तहत अपराधियों पर सीधी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सकेगी। नोटिस जारी करने पर अक्सर आयोग पर पक्षपात के आरोप लगते हैं। एफआईआर एक कानूनी प्रक्रिया है, जिससे आरोपों की गुंजाइश कम हो जाती है।चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जब अपराध स्पष्ट हो, तो नोटिस की प्रक्रिया में उलझना समय की बर्बादी है। सीधे एफआईआर दर्ज करवाना ज्यादा समझदारी भरा और निष्पक्ष कदम है।

खरगे व खेडा मामले में दिखा असर

गौरतलब है कि पवन खेड़ा और खड़गे मामलों में दिखी नई सख्ती देखी गई। इस नई नीति का असर हाल के घटनाक्रमों में 5 अप्रैल को असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर लगाए गए आरोपों पर आयोग ने कोई नोटिस जारी नहीं किया, बल्कि सीधे एफआईआर दर्ज की गई। वहीं 7 अप्रैल को असम की रैली में खड़गे द्वारा की गई कथित सांप्रदायिक टिप्पणियों पर भी भाजपा की मांग के बावजूद नोटिस के बजाय सीधे कानूनी कार्रवाई का रास्ता चुना गया।

अपराध है तो एफआईआर ही उचित

आयोग के अधिकारियों का तर्क है कि सांप्रदायिक अपील, निजी हमले, अभद्र भाषा और मतदाताओं को डराना-धमकाना पहले से ही भारतीय दंड संहिता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अपराध हैं। ऐसे में "चेतावनी" या "निंदा" जैसे कदम बेअसर साबित होते हैं। स्थानीय अधिकारियों को अब निर्देश है कि जहां अपराध स्पष्ट दिखे, वहां सीधे मुकदमा दर्ज किया जाए।

1960 से अब तक का सफर

बता दें कि भारत में आचार संहिता की शुरुआत सबसे पहले 1960 में केरल विधानसभा चुनावों से हुई थी। इसके बाद 1991 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर कड़ाई से लागू किया था। अब 2026 में ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में इसे और भी अधिक मारक और डिजिटल युग के अनुकूल बनाया गया है।

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