- ललिता जोशी
“इंसान गलतियों का पुतला है” अर्थात मनुष्य स्वभाव से त्रुटिपूर्ण और जाने या अनजाने गलतियाँ करता है । जो स्वाभाविक है । यह मुहावरा मानवीय सीमाओं का दर्शाता है । यह मुहावरा संदेश भी देता है कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर और उनसे सीखकर आगे बढ़ना ही इंसानियत और सच्चा ज्ञान है। कोई भी इंसान पूर्ण नहीं है, इसलिए गलतियाँ होना स्वाभाविक ही है ।
आजकल अपने देश में बड़ी -बड़ी गलतियां हो रही हैं जब कोई ऐसी गलतियों को पकड़ ले और सफाई की कोई गुंजाइश नहीं तो माफी मांग लो या फिर गलती करने वालों की जवाबदेही तय कर उन्हें बर्खास्त कर दो । आजकल अपने देश में आए दिन बड़े-बड़े लोग और संस्थान गलतियाँ कर रहे हैं । बड़े लोग बड़ी बातें और गलतियाँ भी बड़ी । मजे की बात ये है कि अगर बच्चे गलती करें तो उनको सभी अहसास कराते हैं कि आपने गलती की है । पहले किसी जमाने में गलतियों पर कान और गाल तमाचे से लाल हो जाता थे चाहे घर हो या विद्यालय । आज तो बच्चों को भी प्यार और दुलार से ही सुधारने का जतन किया जाता है । बच्चे सुधरे या न सुधरे ये तो ईश्वर ही जाने । जब गलती हमारे बड़े करें तो उनको कौन सुधारे ? इन लोगों का अहम इतना होता है कि गलती करने वाला और चौड़े में होता है कि उसे लगता है कि वो गलती कर ही नहीं सकता ।
अब तो गलतियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि राम जी ही जाने क्या होगा। कभी पाठ्यपुस्तकों में बरसों से चले आ रहे पाठों को पुस्तकों से गायब कर दिया जैसे गधे के सिर से सींग । जब विपक्ष का हो हल्ला हुआ तो वास्ता दिया गया सही इतिहास पढ़ने का । अब छात्रों को कुछ नया पढ़ाने के नाम पर एक अध्याय उनकी पाठ्यपुस्तक में शामिल किया लेकिन उसमें न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का आचार परोसा गया । इस आचार से पाठ्यक्रम को स्वाद देने के बजाय उसमें मिर्ची लगा दी और इस मिर्च की मिर्ची सत्तापक्ष के शीर्ष तक पहुँच गई । इसके लिए पाठ लिखने और लिखवाने वालों को काफी कुछ सुनना पड़ा और अपनी सफाई देनी पड़ी कि लिखने वाले ने अपनी भड़ास निकाली है। यह कह कर पल्ला झाड़ लिया । ये क्या बात हुई । अब ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहें है कि ये सब उनकी जानकारी में नहीं था ।
न्यायपालिका पर ये आरोप लगा तो दिया लेकिन अब उसकी कड़ी प्रतिक्रिया को झेलना भारी पड़ रहा है क्योंकि अपने देश के हमाम में सभी निर्वस्त्र हैं । जिसे न देखो वही साहूकार है बाकी सब चोर । जब शासन के दो दिग्गजों का अहंकार टकराएगा तो क्या होगा ? इसके हम सभी साक्षी हैं । इस रस्साकसी में रस्सी का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा लेकिन इस खेल का विजेता कोई एक ही पक्ष होगा ।खेल को खेल भावना से खेला जाए तो आनंद आता है । अगर खेल बदले की भावना से खेला जाए तो उस खेल को युद्ध में परिवर्तित होने में देर नहीं लगती । लोकतन्त्र को लोकतन्त्र रहने दो इसे कोई और तंत्र का मंत्र न बनाओ ।
बालमन पर क्या प्रभाव पड़ेगा जब वो अपने देश की न्यायपालिका के विषय में ये सब पढ़ेगें । देश की भावी पीढ़ी के मन मस्तिष्क पर विष प्रवाह करना क्या उचित है ? अब जब मामले ने तूल पकड़ लिया तो “म्हारे से गलती हो गई “ कह कर माफी तो मांगी जा सकती है । वैसे भी मस्ती और रंगों का त्योहार होली देश में मस्ती की खुमारी मचा रहा है । इसीलिए बुरा न मानो होली है ।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)





.jpg)

No comments:
Post a Comment