आत्मज्ञान की पराकाष्ठा है ‘शिवोऽहम’

- सत्येंद्र प्रकाश तिवारी

‘शिवोऽहम् शिवोऽहम् न च जन्म न च मृत्यु।
न च पापं न च पुण्यं, चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥’
यह मंत्र केवल शब्द नहीं, आत्मा की पुकार है। जब मनुष्य जीवन के शोर से दूर होकर अपने भीतर उतरता है, तब उसे एक सूक्ष्म स्वर सुनाई देता है- वही स्वर जो कहता है कि शिव कहीं बाहर नहीं, भीतर ही विराजमान हैं। भोलेनाथ कोई सीमित व्यक्तित्व नहीं, वे अनंत चेतना हैं। वे न आरंभ हैं, न अंत, न जन्म, न मृत्यु। वे शाश्वत हैं, अचल हैं और सर्वत्र विद्यमान हैं। शिव का स्वरूप अत्यंत सरल और साथ ही अत्यंत गूढ़ है। वे भस्म रमाए हुए, जटाधारी, कैलाशवासी योगी हैं, तो साथ ही करुणा के सागर भी हैं। उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। उनकी जटाओं से प्रवाहित गंगा पवित्रता और जीवनधारा का संदेश देती है। गले में लिपटा सर्प सजगता और निर्भयता का प्रतीक है।
त्रिशूल हमें याद दिलाता है कि जीवन के तीनों गुणों- सत्व, रज और तम पर नियंत्रण आवश्यक है। डमरू से निकलने वाली ध्वनि सृष्टि के आदि नाद की प्रतीक है, जिससे समस्त ब्रह्मांड की रचना हुई। शिव निराकार हैं, फिर भी हम उन्हें साकार रूप में पूजते हैं। शिवलिंग उसी अनंत सत्ता का प्रतीक है, जिसका न आदि है, न अंत। वह बताता है कि सृष्टि एक अखंड ऊर्जा है। शिव वह तत्व हैं, जहां से सब उत्पन्न होता है, जिसमें सब स्थित रहता है और अंतत: जिसमें सब विलीन हो जाता है। वे आकाश के समान व्यापक हैं, सीमाहीन और स्वतंत्र।
भारतीय दर्शन में शिव को केवल संहार का देवता मानना अधूरा दृष्टिकोण है। वे संहार के माध्यम से सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उनका तांडव परिवर्तन का प्रतीक है। जब पुराना और जड़ हो चुका ढांचा टूटता है, तभी नया जीवन जन्म लेता है। इसी प्रकार उनका लास्य सौंदर्य, कोमलता और प्रेम का संदेश देता है। जीवन भी इसी संतुलन का नाम है, कभी संघर्ष, कभी शांति, कभी तप, कभी करुणा। जो इस लय को समझ लेता है, वही जीवन के अर्थ को समझ पाता है। शिव शब्द का अर्थ है- कल्याणकारी। वह जो सबका मंगल करे, वही शिव है। साथ ही शिव का एक अर्थ ‘शून्य’ भी है, वह जो किसी सीमा में बंधा न हो। यह शून्य रिक्तता नहीं, बल्कि अनंत संभावनाओं का आधार है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड उसी चेतना से प्रकट हुआ है और उसी में समा जाएगा।
यह समझ मनुष्य के भीतर विनम्रता और समभाव जगाती है। आदि शंकराचार्य ने ‘शिव: केवलोऽहम्’ कहकर जिस अनुभूति को व्यक्त किया, वह आत्मज्ञान की पराकाष्ठा है। जब साधक ध्यान में लीन होता है, तो वह धीरे-धीरे मन के बंधनों से मुक्त होने लगता है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं से आगे बढक़र वह उस चतुर्थ अवस्था को छूता है, जहां केवल शांति और आनंद है। वहां ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद समाप्त हो जाता है। यही शिवत्व है, पूर्णता का अनुभव।
ग्यानपुर, भदोही।

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