राजनीतिक दलों को याद आने लगे कांशीराम !
नयी दिल्ली। आंबेडकर की तरह कांशीराम भी अब अन्य राजनीतिक दलों को भाने लगे हैं। बेशक कांशीराम की विरासत की इकलौती अधिकारी मायावती और बसपा खुद को बताएं लेकिन खासतौर पर उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को आकर्षित करने के लिए दूसरे दल भी उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों की तरह उत्तर प्रदेश में इस बार भी कांशीराम के जन्मदिन पर सिर्फ बसपा ही नहीं कांग्रेस, सपा और भाजपा भी विभिन्न कार्यक्रमों में दलितों के उत्थान के उनके योगदान की लोगों को याद करा रही है।
मायावती की निगाह में अन्य राजनीतिक दल दलित समुदाय के साथ हमेशा छल करते रहे हैं। उनकी राय में कांशीराम को भी दलित वोटों की लालच में ये दल याद कर रहे हैं। दूसरी ओर ये दल इन आरोपों को खारिज करते हुए कांशीराम को सबका बता रहे हैं।
आंबेडकर के बाद कांशीराम सबसे बड़े दलित आइकॉन
भारतीय राजनीति में दलित वर्ग के बीच सबसे बड़ा नाम डॉक्टर बी.आर.आंबेडकर का है. पिछले कुछ दशकों में उनके बीच कांशीराम को भी अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई। विभिन्न संगठनों के माध्यम से दलितों को जागृत और सशक्त करते हुए कांशीराम ने बसपा के जरिए बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी की। नतीजे में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती की अगुवाई में सिर्फ गठबंधनों ही नहीं 2007- 2012 में पूर्ण गठबंधन की भी सरकार बनी। यहां तक कि 2009 में वाम दलों ने मायावती को प्रधानमंत्री बनने तक का सपना दिखा दिया। हालांकि बसपा का आगे का राजनीतिक सफ़र निराशाजनक रहा। 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव आने तक पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। लोकसभा में वह शून्य पर है।
कांशीराम ने तैयार किया बड़ा वोट बैंक
कांशीराम की कोशिशों ने उत्तर भारत के कई राज्यों में बसपा की राजनीतिक जमीन तैयार की। लेकिन सबसे बड़ी कामयाबी उन्हें उत्तर प्रदेश में मिली। बहुजन के उनके फार्मूले ने दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के गठजोड़ से ऐसा बड़ा वोट बैंक तैयार किया, जिसने सवर्णों के कुछ हिस्से खासतौर पर ब्राह्मणों को भी लुभाया। कांशीराम का 2006 में निधन हो गया था। लेकिन उन्होंने जो फसल तैयार की थी उसे उनकी वारिस मायावती ने 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में काटा इस चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया।प्रदेश की सबसे बड़ी कुर्सी पर अपने समाज की एक महिला के बैठने से उन्हें नया आत्मविश्वास मिला। इसका श्रेय कांशीराम को है, जो अब उनके बीच नहीं हैं, पर यादों में वे स्थायी स्थान प्राप्त कर चुके हैं।
बहुजन थ्योरी को लाए राजनीति के केंद्र में
कांशीराम ने दलित-बहुजन समाज के बीच केवल सामाजिक न्याय का नारा नहीं दिया, बल्कि उन्हें राजनीतिक शक्ति में बदलने में कामयाबी हासिल की। आंबेडकर ने दलित राजनीति को वैचारिक आधार दिया तो कांशीराम को उस विचार को राजनीतिक संगठन और सत्ता तक पहुंचाने के सफल रणनीतिकार के तौर पर मान्यता प्राप्त है।
बामसेफ, डी एस -4 और फिर बहुजन समाज पार्टी के जरिए कांशीराम ने बहुजन की थ्योरी को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। कांशीराम ने आंबेडकर की इस सीख की गांठ बांधी कि सामाजिक तरक्की और बदलाव के लिए राजनीतिक ताकत जरूरी है। उनका मानना था कि दलितों की सामाजिक स्थिति तब तक नहीं बदल सकती जब तक वे सत्ता संरचना में भागीदार न बनें।
जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी
राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए वे अचानक राजनीति के मैदान में नहीं उतरे। बामसेफ के जरिए 1978 में कांशीराम ने सरकारी कर्मचारियों के बीच संगठन निर्माण शुरू किया. इस संगठन का उद्देश्य था, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारियों – कर्मचारियों को सामाजिक आंदोलन से जोड़ना और उनके आर्थिक और बौद्धिक संसाधनों का उपयोग बहुजन आंदोलन के लिए करना।
राजनीति विज्ञानी सुधा पाई ने अपनी किताब The Rise of the BSP में लिखा कि बामसेफ कांशीराम की दीर्घकालिक रणनीति का पहला चरण था। यह संगठन सीधे चुनावी राजनीति में नहीं था, बल्कि कैडर निर्माण का जरिया था। 1984 में कांशीराम ने दूसरा संगठन DS 4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समित ) बनाया जिसका नारा था ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड, बाकी सब हैं DS4। इस नारे के माध्यम से कांशीराम ने बहुजन बनाम सवर्ण प्रभुत्व की रेखा खींची। मकसद था दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को एक अलग साझा राजनीतिक पहचान देना और सत्ता परिवर्तन के आंदोलन के लिए संगठित करना।इन तैयारियों के बाद 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। ‘ जिसकी जितनी संख्या भारी – उसकी उतनी हिस्सेदारी ‘ को पार्टी ने अपना मूल मंत्र बनाया।
दूसरे दलों के दलित नेताओं पर साधा निशाना
कांशीराम ने देश की लगभग 85% आबादी जिसमें दलित ,पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक शामिल हैं को संगठित करने का लक्ष्य रखा और माना कि इस समूह के हाथों में सत्ता आने पर ही सामाजिक संरचना में बदलाव मुमकिन होगा। अन्य वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता के पहले कांशीराम के लिए जरूरी था कि दलितों के बीच वे स्वीकार किए जाएं। इसके लिए उन्होंने उन दलित नेताओं पर प्रहार किया जो कि कहने के लिए दलितों के लेकिन सही में सवर्णों के पोषक हैं।
1982 में कांशीराम ने अपनी चर्चित पुस्तक The Chamcha Age में चमचा का प्रयोग उन दलित नेताओं के लिए किया जो उनके अनुसार सवर्ण राजनीतिक दलों के हित में काम करते थे। कांशीराम ने लिखा कि दलित राजनीति का सबसे बड़ा संकट चमचा संस्कृति है जहां दलित नेता स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने के बजाय दूसरों की राजनीति का उपकरण बन जाते हैं। यह किताब दलित राजनीति में एक वैचारिक दस्तावेज के रूप में मानी जाती है।
सत्ता बिना समाज नहीं बदलता
अपने भाषणों में कांशीराम बार-बार दोहराते रहे कि हम इस देश की 85 प्रतिशत आबादी हैं। लेकिन सत्ता पर हमारा नियंत्रण नहीं है। जब बहुजन संगठित होंगे, तब सत्ता भी बदलेगी और समाज भी। लेकिन इस बदलाव की पहली शर्त संगठन की मजबूती थी, क्योंकि उनके अनुसार संगठन के बिना समाज केवल भीड़ होता है। जबकि संगठन उसे शक्ति में बदल देता है। सामाजिक बदलाव के लिए वे सत्ता को जरूरी मानते थे और बेहिचक कहते रहे कि हम सत्ता के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि सत्ता से ही समाज बदलता है। उन्हें अन्य दलों के दलित नेताओं पर भरोसा नहीं था।
अपने विषय में उनका दावा था कि वे नेता पैदा करने निकले हैं , न कि चमचे. मायावती को उन्होंने अपना राजनीतिक वारिस बनाया और कहा कि मैं ऐसी नेता तैयार करूंगा कि बड़े-बड़े लोग उसके सामने सिर झुकाएंगे। 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी. दलित राजनीति की यह ऐतिहासिक घटना कांशीराम के मिशन की कामयाबी का सबूत थी।
बसपा हुई कमजोर, दूसरे दलों में कांशीराम की विरासत पर होड़
मायावती ने एक नहीं चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की। तीन बार भाजपा की मदद से और आखिरी बार 2007-12 में अकेले बसपा के पूर्ण बहुमत से। लेकिन 2014 से बसपा की हार का सिलसिला शुरू हुआ। फिर 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव और 2019, 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी पराजय जारी रही। बसपा के हाशिए पर जाने के साथ ही उसके दलित वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की अन्य दलों के बीच खासतौर पर उत्तर प्रदेश में होड़ है।
कांशीराम की विरासत पर दावेदारी उसका जरिया है। निधन के बाद कांशीराम सपा, कांग्रेस और भाजपा सभी को स्वीकार्य हैं। उत्तर भारत की राजनीति में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाता है। लेकिन कांशीराम इसलिए और भी लुभाते हैं क्योंकि उन्होंने केवल दलित राजनीति नहीं की बल्कि बहुजन यानी दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यको की साझा राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की। उनकी विरासत उत्तर भारत की राजनीति में एक व्यापक प्रतीक बन चुकी है।
समाजवादी पार्टी उन्हें बहुजन-समाजवादी परंपरा से जोड़ने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस सामाजिक न्याय की राजनीति के संदर्भ में उनका उल्लेख कर रही है तो भाजपा दलित प्रतीकों के राष्ट्रीय सम्मान की राजनीति के तहत उन्हें स्थान देने लगी है।


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