लड़ाई का बढ़ता दायरा
इलमा अज़ीम
ईरान की लड़ाई का दायरा धीरे-धीरे फैलता जा रहा है और यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह विश्व युद्ध का रूप न धारण कर ले। पहले दो युद्ध मोटे तौर पर यूरोप के युद्ध थे, यद्यपि उसमें एशिया का जापान और किसी सीमा तक चीन भी शामिल था। भारत की सेना उसमें इसलिए भाग ले रही थी क्योंकि यहां कब्जा इंग्लैंड का था। लेकिन यह युद्ध लड़ा एशिया में जा रहा है। इसमें अमेरिका, कहा जा रहा है इजराइल की सहायता के लिए कूदा है।
जब से एशिया में से यूरोपीय देशों का कब्जा हटा है, तब से उसका स्थान अमेरिका ने संभाल लिया है। अमेरिका और यूरोप के तौर-तरीके में एक फर्क है। यूरोप के लोग सीधे सीधे एशिया के देश पर कब्जा कर वहां की सत्ता संभाल लेते थे और उस देश का आर्थिक व सांस्कृतिक शोषण करते थे। लेकिन अमेरिका का तौर तरीका थोड़ा अलग है। वह किसी देश की सत्ता पर सीधा कब्जा नहीं करता, लेकिन उस देश में अपनी समर्थक और परोक्ष रूप से नियंत्रित सरकार स्थापित कर देता है। पिछले लम्बे अरसे से अमेरिका ईरान सरकार को हटा कर वहां अपनी समर्थक सरकार बनाना चाहता था। लेकिन उसमें सफल नहीं हो रहा था। इजराइल के युद्ध का लाभ उठा कर उसने ईरान में भी तख्ता पलट का अवसर देखा और उसमें कूद पड़ा है।
अमेरिका में ट्रम्प के समय में केवल इतना परिवर्तन हुआ है कि पहले वह यह काम पर्दे के पीछे रह कर करता था, अब वह सामने आकर और खुले में करता ही नहीं, बल्कि कहता भी है कि उसे जो व्यक्ति स्वीकार्य होगा, वही ईरान की सत्ता सम्भाल सकता है। सबसे पहली गड़बड़ तो यह हो गई कि जिस सत्ता को वह ईरान से उखाडऩा चाहता था, उसका प्रशासनिक ढांचा कितना गहरा था, शायद अमेरिका को उसका अंदाजा नहीं था। उसने सोचा था खामेनेई को मारने से वहां शून्य व्याप्त हो जाएगा, लेकिन वहां ऐसा नहीं हुआ। सबसे बड़ी बात, ईरान ने बड़ी ही सधी हुई रणनीति से, अमेरिका समर्थक अरब देशों पर भी एक साथ हमला कर दिया। इस तरह से महसूस हो रहा है कि इस युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है, जो सीधी और स्पष्ट तौर पर हमारे हित में नहीं है।





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