शिक्षा के अनुरूप हो रोजगार
 कवलजीत सिंह 
रोजगारपरक शिक्षा के अभाव में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। लग रहा है कि अब केवल शिक्षा ही रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। हाल के कुछ सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि देश में चालीस प्रतिशत युवा स्नातकों को बेरोजगार रहना पड़ता है। साथ ही उनमें से केवल सात फीसदी को ही एक वर्ष के भीतर स्थिर वेतन वाली नौकरियां मिल पाती हैं।
 ये आंकड़े देश में रोजगार सृजन और उच्च शिक्षा तक पहुंच के बीच के असंतुलन को ही उजागर करते हैं। अगर यह हकीकत है तो दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले देश के लिये यह सुखद संकेत नहीं कहा सकता है। अन्य शब्दों में कहें तो स्नातक होने और रोजगार के अवसरों के बीच व्याप्त असंतुलन के चलते भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश के कालांतर जनसांख्यिकीय दायित्व में तब्दील होने का खतरा पैदा हो रहा है। 

जिसे देश के नीति-नियंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए। भविष्य में पर्याप्त और लाभकारी रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए जाते हैं तो देश में बेरोजगारी बढ़ने से युवाओं के कुंठित होने का खतरा पैदा हो सकता है। वास्तव में यहां प्रश्न केवल संख्या का ही नहीं है वरन यह रोजगार की गुणवत्ता का भी सवाल है।

 देश में कई स्नातक ऐसे संस्थानों से निकलते हैं, जो शिक्षकों की कमी, पुराने पाठ्यक्रम और कमजोर उद्योग संबंधों जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। विडंबना यह भी है कि देश में कुशल श्रम को रोजगार देने में सक्षम क्षेत्र, मसलन विनिर्माण और उच्च मूल्य वाली सेवाएं पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुई हैं। मौजूदा परिदृश्य में देश को नामांकन बढ़ाने की प्राथमिकता से हटकर रोजगार क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके साथ ही यह भी जरूरी होगा कि देश की आर्थिक नीति को तेजी से बढ़ते शिक्षित कार्यबल की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाए। 

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