रोजगार पर मंथन जरूरी
ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले शहरी क्षेत्र में बेराोजगारी ज्यादा
इलमा अज़ीम
भारत दुनिया में युवाओं के देश के रूप में जाना जाता है। लेकिन हम इस युवा शक्ति का भरपूर उपयोग राष्ट्र विकास में नहीं कर पा रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि देश के शहरी क्षेत्र में पंद्रह वर्ष से अधिक आयुवर्ग के युवाओं में बेरोजगारी की दर गांवों के मुकाबले ज्यादा है। जहां शहरों में यह प्रतिशत बढ़कर 6.7 फीसदी हुआ है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में यह 3.9 फीसदी स्थिर है।
हाल ही के वर्षों में बेरोजगारी देश में बड़ा मुद्दा रहा है, जो भारत जैसे विकासशील देश के हित में नहीं है। इस मुद्दे पर निश्चित रूप से देश के नीति-नियंताओं को मंथन करना चाहिए कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे अभियानों के जमीनी परिणाम उत्साहवर्धक क्यों नहीं हैं? युवाओं की कौशल विकास कार्यक्रमों में भागीदारी के बावजूद रोजगार के मौके क्यों नहीं बढ़ रहे हैं? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रही है? विडंबना यह भी है कि बढ़ती आबादी के बावजूद सरकारी क्षेत्र की नौकरियां कम हो रही हैं।
युवाओं की शिकायत होती है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया में तमाम तरह की विसंगतियां व्याप्त हैं। वे परीक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाते रहे हैं। निस्संदेह, बढ़ती बेरोजगारी हमारे विकास के मापदंडों पर भी सवाल खड़ी करती है। निश्चित रूप से संतुलित आर्थिक विकास की सार्थकता के लिए जरूरी है कि देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़े तथा आर्थिक असमानता भी दूर हो।
तेज विकास दर के साथ लोगों के जीवन में खुशहाली भी आनी चाहिए। रोजगार के अवसर बढ़ने से ही समाज में खुशहाली आ सकती है। जब देश में रोजगार के मौके बढ़ेंगे तो समाज में वास्तविक समृद्धि आ सकती है। रोजगार के अवसर बढ़ने से उत्पादकता बढ़ेगी और महंगाई पर नियंत्रण पाने में भी मदद मिलेगी।
किसी भी अर्थव्यवस्था में विकास दर तभी सार्थक होगी, जब रोजगार के नये मौके उपलब्ध हो रहे हों। नीति-नियंताओं को आत्ममंथन करना होगा कि दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था में रोजगार के नये अवसर क्यों नहीं बन रहे हैं। सरकारें सुनिश्चित करें कि युवाओं को देश की तरक्की में योगदान देने का अवसर मिले।
लेखिका एक स्वत्रंत पत्रकार है





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