बढ़ती गर्मी और फसल
इमला अज़ीम
जलवायु परिवर्तन के चलते फरवरी में तापमान सामान्य से ज्यादा हो रहा है। इसका प्रभाव गेहूं आदि रबी फसलों व आम की पैदावार पर है। यानी खाद्य सुरक्षा संकट में है। इसका समाधान ‘क्लाइमेट स्मार्ट कृषि’ में निहित है। फरवरी के मध्य में ही देश के एक बड़े हिस्से में पारा 30 से 32 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है, जो सामान्य से करीब 5 से 7 डिग्री अधिक है।
यह केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का वह क्रूर चेहरा है जो सीधे हमारी थाली और देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर रहा है। जलवायु परिवर्तन का सबसे घातक प्रहार हमारी खाद्य सुरक्षा और ‘फलों के राजा’ आम पर हो रहा है। रबी की मुख्य फसल गेहूं के लिए फरवरी का दूसरा पखवाड़ा ‘ग्रैन फिलिंग’ यानी बालियों में दाना भरने की अवस्था का होता है। इस नाजुक दौर में अचानक बढ़ी गर्मी 'थर्मल स्ट्रेस' पैदा कर रही है।
जब तापमान 30 डिग्री के ऊपर बना रहता है, तो पौधों के भीतर चयापचय की प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज हो जाती है और दाना पूरी तरह विकसित होने से पहले ही सख्त होने लगता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में 'फोर्स्ड मेच्योरिटी' कहा जाता है। परिणामस्वरूप, दाना छोटा, हल्का और झुर्रियों वाला रह जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि तापमान में इसी तरह की वृद्धि जारी रही, तो गेहूं की पैदावार में प्रति हेक्टेयर 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
इसका असर केवल गेहूं और आम पर ही नहीं, बल्कि सरसों और दलहन पर भी पड़ रहा है। सरसों की फलियों में तेल की मात्रा कम होने की आशंका है और चने के पौधों में फूल समय से पहले ही झड़ रहे हैं। इस विकट परिस्थिति का निदान अब केवल पारंपरिक खेती के ढर्रे पर चलकर संभव नहीं है। हमें ‘क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर’ यानी जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर युद्धस्तर पर बढ़ना होगा।





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