प्रकृति संरक्षण और कानून
राजीव त्यागी
हमने विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के ढेर तो खड़े कर लिए, लेकिन इसकी वजह से नदियों को विषाक्त नालों और हरे-भरे जंगलों को रेगिस्तान में तब्दील कर दिया। आज जब हिमालय की नींव धंस रही है और हवा सांसों में जहर घोल रही है, तब एक तीखा सवाल सामने है - क्या अपराध इंसानों के खिलाफ ही ‘संगीन’ होते हैं? इसी सवाल से एक क्रांतिकारी शब्द ने जन्म लिया - ‘ईकोसाइड’ यानी ‘प्रकृति का नरसंहार’।
जिस प्रकार विश्व ने ‘जेनोसाइड’ को मानवता के विरुद्ध वीभत्स अपराध मानकर दंडित किया, अब प्रकृति के विरुद्ध किए जा रहे इस व्यवस्थित विनाश को भी उसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी श्रेणी में रखा जाए। अब न्याय केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जंगलों और नदियों के लिए भी होना चाहिए, जिनका अस्तित्व हमारी लालसा की भेंट चढ़ गया। बड़ी कंपनियां और औद्योगिक घराने पर्यावरण विनाश से भारी मुनाफा कमाते हैं और कानूनों का उल्लंघन करने पर लगने वाले जुर्माने को अपनी बैलेंस शीट में मामूली खर्च मानकर चुका देते हैं।
इस व्यवस्था ने पैसे को संरक्षण के बजाय विनाश का ‘लाइसेंस’ बना दिया है। ईकोसाइड की अवधारणा इसी खामी पर प्रहार करते हुए नागरिक दायित्व को ‘कठोर आपराधिक उत्तरदायित्व’ में बदलने की वकालत करती है। संदेश देती है कि प्रकृति कोई ‘कमोडिटी’ नहीं जिसे नष्ट करके उसकी कीमत चंद रुपयों में चुकाई जा सके; बल्कि जीवंत इकाई है।
वैश्विक स्तर पर ईकोसाइड को अपराध घोषित करने की मुहिम तेज हो रही है, जहां बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों ने अपने घरेलू कानूनों में इसे शामिल कर मिसाल पेश की है। वर्तमान में ‘स्टॉप ईकोसाइड इंटरनेशनल’ जैसे संगठन यह प्रयास कर रहे हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की ‘रोम संविधि’ में संशोधन कर ईकोसाइड को नरसंहार और युद्ध अपराधों की श्रेणी में ‘पांचवां अंतर्राष्ट्रीय अपराध’ घोषित किया जाए। ताकि कोई राष्ट्र या कॉर्पोरेट विकास की आड़ में पर्यावरण को अपूरणीय क्षति न पहुंचा सके।





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