बड़े बेआबरू होकर निकले तेरे कूचे से...!


- ललिता जोशी
फरवरी का महीना वर्ष का दूसरा महीना होता है । जैसे वर्ष के और महीने वैसे ही हमारी फरवरी भी। अरे ये महीना वर्ष का सबसे उत्तम महीना है । इस महीने में सरकार बजट प्रस्तुत करती है । बजट का आरंभ वर्षों से हलवा सेरेमनी से किया जाता रहा है। इधर बजट प्रस्तुत उधर विपक्षी सांसदों का बजट पर अपना आख्यान या फिर व्याख्यान आरंभ।
पक्ष बजट को उस  सर्वगुण सम्पन्न कन्या की तरह लगता जिसके 36 के 36 गुण अर्थव्यवस्था के साथ मिलते हैं । विपक्ष को यही बजट उस सांड की तरह लगता है जो हरे -भरे खेत को उजाड़ देता है । बजट पर संसद से सड़क तक गरमा -गरम बहस चल रही है । पत्रकार महोदय अपने चैनलों पर बजट की चौपाल लगाकर बैठ जाते हैं ।
सरकार के पैरोकार मानते हैं कि रोजगार के अवसर दौगुने करने का दावा, स्किल डेवलपमेंट और उत्पाद को बढ़ावा देना इत्यादि इत्यादि । हाई स्पीड कॉरीडोर, लड़कियों के लिए हॉस्टल, इलेक्ट्रॉनिक्स मनुफ़ैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए राशि स्टार्टअप स्पेस स्वास्थ्य और सांस्कृतिक ढांचे वाली यूनिवर्सिटी, किसानों की आय बढ़ाने के लिए बजट और न जाने कितने ही वादे। जब-जब बजट पेश किया जाता है तब -तब एक आदमी आदमी की सरकार से ये आशा रहती है कि उसे कुछ नई राहत मिलेगी और उसका जीवन सुखमय बनेगा।
आम आदमी को  टैक्स लिमिट में कुछ भी बढ़ोतरी नहीं । लगता मिडिल क्लास खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ जाएंगे की फिलोस्फी को जीवंत करता देता है। सरकार को इसकी कोई दरकार नहीं । सरकार का बयान है वो समाज के सभी पक्षों का ध्यान रखती है। जीडीपी, फ़िस्कल घाटा जैसे टेक्निकल शब्द तो हमारे सिर के ऊपर से निकल जाते हैं । पल्ले में ठरते ही नहीं हैं ऐसे टर्म्स । भई आम आदमी को तो अपने रोज़मर्रा में काम आने वाली वस्तुओं की कीमतों से मतलब होता है । गृहणियों को अपने रसोई की वस्तुएं के दाम से मतलब होता है । उनको गैस के सिलेंडर दामों से मतलब होता है ।
बेरोजगारों को रोजगार चाहिये । मगर कितने युवाओं को रोजगार मिल रहा है वो तो जी राम जी को ही मालूम होगा। किसान भी अलग से निराश हुआ पड़ा है। बेचारा बजट भी करे तो क्या करे वो बेचारा तो वित्तमंत्री जी और उनकी टीम पर निर्भर है । उसको उन लोगों ने गढ़ा है और पढ़ा है । बेचारा जैसे ही बाहर आता है वैसे ही बवाल शुरू हो जाता है । लगता है महाभारत शुरू हो गया और बजट बेचारा विपक्ष की नज़रों में बड़े बेआबरू होकर निकले तेरे कूचे से ...।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)

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