गैर जिम्मेदार तंत्र
 सपना सीपी साहू 

इंदौर में दूषित पानी पीने से 23वीं मौत हो गई। यह  कितना शर्मनाक है कि सरकार हाईकोर्ट में दावा कर रही है कि हालात काबू में हैं जबकि अस्पतालों में पीड़ितों के पहुंचने का सिलसिला अभी भी जारी है। दुखद यह है कि अभी भी प्रभावित क्षेत्र भगीरथपुरा में पेयजल संकट बरकरार है।
 देश में नीति आयोग की मानें तो हर साल दूषित पानी पीने से दो लाख लोगों की मौत होती है, विशेषज्ञ इनकी तादाद कहीं ज्यादा बताते हैं। नीति आयोग की मानें तो देश में तकरीबन 60 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। इससे 6 फीसदी जीडीपी का नुकसान होता है। पेयजल की गुणवत्ता के मामले में हमारे देश का दुनिया के 122 देशों में 120वां स्थान है। 


असलियत में दूषित पानी पीने से होने वाली मौतें विकास के दावों को मुंह चिड़ाती प्रतीत होती हैं। इससे जल जीवन मिशन की नाकामी साबित होती है। शुद्ध पेयजल की व्यवस्था में नाकामी में सरकारी अनियमितताओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उसका जीता-जागता सबूत हैं शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सीवर लाइन के लिए स्वीकृत 1.93 लाख करोड़ की परियोजनाओं में अभी तक केवल 44 हजार करोड़ के काम पूरे हो पाना। जबकि इनकी अवधि इसी मार्च में पूरी हो रही है। 


पीने के पानी की लाइनों का पुराना होना, मरम्मत और देखभाल का अभाव, खराब योजना और डिजाइन, जल संचय का अपर्याप्त प्रबंधन, शुद्धीकरण के लिए व्यवस्था और निगरानी की कमी, और उपभोक्ता स्तर पर घरों से पानी के सैंपल लेकर जांच की व्यवस्था न होना, साथ ही भ्रष्टाचार, इन सभी कारणों से जल आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है। जनता मजबूरी में प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है। सबसे बड़ी बात यह कि जब पेय जलापूर्ति राज्य की प्राथमिकता में ही न हो, तब शुद्ध पानी सपना ही बना रहेगा।
 लेखिका  इंदौर की एक स्वत्रंत पत्रकार है। ये उनके अपने विचार है। 

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