नया साल: सीख, सुधार और संकल्प


- हरिओम हंसराज
नया साल केवल जश्न और उत्सव का समय नहीं है, बल्कि यह बीते वर्ष का गहन मूल्यांकन और आने वाले वर्ष के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का अवसर भी है। भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में नीतियाँ और योजनाएँ व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिणाम पैदा करती हैं, जिनमें सफलता के साथ असफलताएँ भी शामिल होती हैं। असफलताओं से सीखकर ही सरकार रणनीतियाँ सुधारती है और समाज चुनौतियों के लिए तैयार होता है। हमारे सामने 2025 का वर्ष ऐसे ही अनुभवों का मिश्रण रहा है,जहाँ सफलता के संकेत स्पष्ट हैं, वहीं अधूरे परिणामों ने हमें महत्वपूर्ण सबक भी दिए हैं।



सबसे पहले भारत की आर्थिक प्रगति को देखें तो इकोनॉमिक्स सर्वे 2025 के अनुसार भारत की जीडीपी विकास दर वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 6.4% रही, और वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनुमान 6.3% से 6.8% के बीच रखा गया है। यह दर महामारी के बाद की वैश्विक मंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था की स्थिरता दर्शाती है। इसी बीच भारत की औद्योगिक गतिविधियाँ भी मजबूत हुईं,इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन ने नवंबर 2025 में 6.7% की वृद्धि दर्ज की है, जो दो साल में सबसे ऊँचा स्तर है। ये संकेत हैं कि आर्थिक आधार मजबूत बनने लगा है, लेकिन सफलता का पूरा लाभ लोगों तक पहुँचाना आवश्यक चुनौती बनी हुई है।

रोजगार के मुद्दे में भी उन्नति के साथ कमियाँ स्पष्ट है। पीरियाडिक लेबर फाॅर्स सर्वे (पी एल एफ एस) के अनुसार 2025 के क्यू2 में बेरोजगारी दर 5.2% थी, जिसमें ग्रामीण बेरोजगारी 4.4% और शहरी बेरोजगारी लगभग 6.9% थी। जबकि दर पिछले वर्षों की तुलना में एक सकारात्मक संकेत है, युवाओं और शहरी क्षेत्रों में रोजगार की कमी अभी भी चिंता का विषय है। असफलता यह है कि समूची श्रम शक्ति की लेबर फाॅर्स पार्टिसिपेशन रेट (एल एफ पी आर) 55% के आसपास बनी हुई है, जो अभी भी अपेक्षित स्तर से नीचे है। यह दर्शाता है कि सरकार को कौशल प्रशिक्षण, रोजगार सृजन और उद्योग-शिक्षा तालमेल पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है।



सरकार ने बेरोजगारी चुनौती से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएँ शुरू की हैं। जुलाई 2025 में केंद्रीय कैबिनेट ने ₹1,00,000 करोड़ एम्प्लॉयमेंट-लिंकड इंसेंटिव योजना को मंज़ूरी दी, जिसका लक्ष्य अगस्त 2025 से जुलाई 2027 तक लगभग 3.5 करोड़ नौकरियाँ सृजित करना है।यह प्रयास यह समझने की कोशिश है कि असफलताओं को पहचान कर नई नीतियों के माध्यम से समाधान ढूँढा जाए,जो नई पीढ़ी के लिए अवसर प्रदान करे।

ग्रामीण रोजगार की राजनीति भी सामाजिक पाठ देती है। मनरेगा अब विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार एंड अजीविका मिशन (ग्रामीण) में परिवर्तित हो गया, लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि कमज़ोर क्रियान्वयन के कारण कुछ राज्यों में लाभ सीमित रहा। उदाहरण के लिए पंजाब में औसतन हर गृहस्थी को केवल 27 दिनों का रोजगार मिला, जबकि राष्ट्रीय औसत 36 दिनों का रहा। यह असफलता बताती है कि योजनाओं की घोषणा और अमल में अंतर सामाजिक लाभ को प्रभावित कर रहा है।

सरकार की सामाजिक योजनाएँ जैसे जन-धन योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन, आदि ने लाखों परिवारों को बुनियादी सुविधाएँ प्रदान कीं। इकोनॉमिक्स सर्वे के अनुसार 12 करोड़ से अधिक परिवारों को नल द्वारा पीने का पानी प्रदान किया गया, और ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों गाँवों को स्वच्छता की श्रेणियों में उन्नत किया गया। यह सामाजिक प्रगति का मजबूत संकेत है, लेकिन इसे सभी क्षेत्रों में समान रूप से लागू करना अभी भी एक चुनौती है।

अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्र जैसे स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भी सरकार की योजनाएँ सफल रही हैं।प्रोडक्शन लिंकड इंसेंटिव योजनाओं के माध्यम से भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण ने निवेश और रोजगार दोनों को बढ़ावा दिया है, जो मेक इन इंडिया का आधार मजबूत कर रहा है। यह दर्शाता है कि आर्थिक प्रोत्साहन योजनाओं का दीर्घकालिक प्रभाव सामाजिक विकास में सकारात्मक रूप से दिखाई दे रहा है।

इसके बावजूद वित्तीय समावेशन और असमानता का प्रश्न अभी भी महत्वपूर्ण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार गिनी कोएफ़्फ़िइंट में गिरावट आई है, जो असमानता में कुछ सुधार का संकेत है, लेकिन वैश्विक रिपोर्टें यह भी इंगित करती हैं कि संपत्ति और आय में असमानता अभी भी व्यापक है।यह सीख हमें यह समझाती है कि सिर्फ आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होती,इसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचना चाहिए।

राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका में यह स्पष्ट हुआ है कि असफलताओं से सीखने का अर्थ नीतियाँ पुनः तैयार करना और अमल में मजबूती लाना है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप पर जोर, समान शिक्षा अवसर और स्वास्थ्य सेवा सुधार जैसी प्रविधियाँ 2025 में आगे बढ़ीं, लेकिन इनका सामाजिक प्रभाव अधिक गहरा और समावेशी बनाना एक निरंतर चुनौती है।



नया साल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सफलताओं के उत्सव का समय होने के साथ-साथ असफलताओं का विश्लेषण कर नई रणनीति बनाने का अवसर भी है। असफलता को शर्मिंदगी के रूप में न देखकर, एक सीख के रूप में अपनाया जाना चाहिए,ताकि सरकार और समाज मिलकर वह भारत तैयार करें, जहाँ समृद्धि, समानता और अवसर सभी तक पहुँचें। इस दृष्टिकोण में ही 2026 के लिए हमारी उम्मीदें और प्रयास सार्थक बने रहेंगे।

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