आर्थिक मजबूती और बाजार की दिशा
- प्रो. दिनेश कुमार
आज की गहराई से परस्पर जुड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी एक देश की आर्थिक या राजनीतिक घटना का प्रभाव सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहता। सरकारी नीतिगत निर्णय, आर्थिक उतार-चढ़ाव तथा भू-राजनीतिक तनाव विश्वभर के वित्तीय बाजारों को प्रभावित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निवेशकों की धारणा और शेयर मूल्यों में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिलता है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार अब ऐसी किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हैं, चाहे वह दुनिया के किसी भी हिस्से में घटित हुई हो।
विशेषकर सतर्क और विवेकपूर्ण निवेश दृष्टिकोण अपनाने वाले निवेशकों के लिए इन वैश्विक अंतर्संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है। यह समझ न केवल बाजार की अनिश्चितताओं से निपटने में सहायक होती है, बल्कि निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो की सुरक्षा करने और अस्थिरता के समय उभरने वाले अवसरों की पहचान करने में भी सक्षम बनाती है।



2025 पर नज़र डालें तो, भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मज़बूत विकास, नीतिगत उपायों और घरेलू निवेशक गतिविधियों के समर्थन से लचीलापन दिखाया। आइए जानें कि इन कारकों ने पिछले वर्ष निवेश को कैसे प्रभावित किया और 2026 में किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
जीडीपी वृद्धि से मजबूत हुआ आर्थिक आधार
वित्त वर्ष 2025–26 की दूसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय मजबूती का परिचय देते हुए 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कहीं अधिक थी। वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं, विशेषकर अमेरिकी टैरिफ दबावों के बावजूद, तीसरी तिमाही में भी यही गति बनी रही, जिससे भारत की आंतरिक आर्थिक शक्ति स्पष्ट रूप से सामने आई। यह वृद्धि बहु-क्षेत्रीय रही। विनिर्माण क्षेत्र में 9 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि वित्त एवं अन्य सेवा क्षेत्रों ने भी दो अंकों की वृद्धि बनाए रखी। घरेलू मांग इस विस्तार का प्रमुख आधार रही, जिसमें उपभोक्ता व्यय बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 60 प्रतिशत हो गया । मजबूत आर्थिक संकेतकों का सीधा असर पूंजी बाजारों पर पड़ा। उपभोक्ता वस्तुओं, अवसंरचना और पूंजीगत क्षेत्रों में निवेशकों का भरोसा बढ़ा, जिससे शेयर बाजारों में तेजी देखने को मिली। निजी पूंजीगत व्यय में वृद्धि ने विशेष रूप से मिड-कैप शेयरों को समर्थन दिया और भारत की छवि एक स्थिर तथा दीर्घकालिक निवेश गंतव्य के रूप में और सुदृढ़ हुई। नियंत्रित मुद्रास्फीति और कर संरचना में सुधारों ने कॉरपोरेट लाभप्रदता को बढ़ावा दिया, जिसका सकारात्मक प्रभाव सूचकांकों के प्रदर्शन में दिखाई दिया ।

मौद्रिक नीति से मिला अतिरिक्त सहारा
आर्थिक वृद्धि को मजबूती देने में भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति ने भी अहम भूमिका निभाई। दिसंबर में केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती कर इसे 5.25 प्रतिशत कर दिया, जिससे बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त तरलता उपलब्ध हुई । यह निर्णय कोर मुद्रास्फीति के नरम होने के बाद लिया गया, जिससे विकास और मूल्य स्थिरता के बीच संतुलन साधा जा सके ।
नीतिगत संकेतों से यह भी स्पष्ट हुआ कि बाहरी जोखिमों में कमी आने पर भविष्य में और दर कटौती की गुंजाइश बनी रह सकती है । बाजारों ने इस कदम का स्वागत किया । ब्याज दरों में कमी से आवास और ऑटोमोबाइल जैसे ब्याज-संवेदनशील क्षेत्रों में मांग बढ़ी, जिससे एनबीएफसी और रियल एस्टेट कंपनियों के शेयरों में सुधार देखा गया । साथ ही, बॉन्ड यील्ड में गिरावट से डेट फंडों की आकर्षण क्षमता बढ़ी और खुदरा निवेशकों के लिए ऋण की किस्तें अधिक किफायती बनी रहीं, जिससे एसआईपी प्रवाह स्थिर बना रहा ।
व्यापार समझौतों से निर्यात को मिला बल
वैश्विक स्तर पर भारत की व्यापार कूटनीति ने भी वर्ष के दौरान गति पकड़ी। ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौते सहित कई अहम समझौतों को अंतिम रूप दिया गया, जिनसे दीर्घकाल में व्यापार और निवेश को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, ईएफटीए और अन्य साझेदार देशों के साथ हुए समझौतों ने निर्यात बाजारों के विविधीकरण में मदद की ।


इन पहलों का लाभ यह हुआ कि कुछ क्षेत्रों—विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, वस्त्र और इलेक्ट्रॉनिक्स—को वैश्विक व्यापार दबावों से आंशिक सुरक्षा मिली। परिणामस्वरूप, निर्यात प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार देखा गया और निवेशकों का रुझान निर्यात-उन्मुख उद्योगों की ओर बढ़ा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के भारत की ओर स्थानांतरित होने की प्रवृत्ति ने भी मिड-कैप शेयरों को अतिरिक्त समर्थन प्रदान किया।
घरेलू निवेशकों ने संभाली बाजार की कमान
हालांकि वैश्विक अनिश्चितताओं और अमेरिकी मौद्रिक सख्ती के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का रुझान कमजोर रहा और बड़े पैमाने पर निकासी देखने को मिली, लेकिन घरेलू निवेशकों ने बाजार को स्थिर बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई ।
खुदरा निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों की निरंतर भागीदारी ने विदेशी बिकवाली के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया। विशेष रूप से एसआईपी के माध्यम से होने वाले निवेश में तेज वृद्धि देखी गई, जिसने बाजार को दीर्घकालिक आधार प्रदान किया। इस घरेलू समर्थन से लार्ज-कैप और डेट साधनों को मजबूती मिली, हालांकि मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में अधिक उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला ।
पीएलआई योजनाओं से विनिर्माण को प्रोत्साहन
सरकार की उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने औद्योगिक गतिविधियों को नई ऊर्जा दी। विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश, रोजगार सृजन और उत्पादन विस्तार ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बल प्रदान किया। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में इन योजनाओं का विशेष प्रभाव देखने को मिला। पूंजी बाजारों में भी इसका असर स्पष्ट रहा । पीएलआई से लाभान्वित कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की रुचि बढ़ी और दीर्घकालिक दृष्टि रखने वाले निवेशकों को बेहतर अवसर मिले। आयात निर्भरता में कमी से मुद्रा स्थिरता को भी समर्थन मिला ।
भू-राजनीतिक जोखिम: चुनौती और अवसर
इन सकारात्मक पहलुओं के बीच भू-राजनीतिक तनाव एक स्थायी जोखिम के रूप में मौजूद रहे। सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव और वैश्विक संघर्षों ने ऊर्जा कीमतों और निवेश भावना को प्रभावित किया। हालांकि कच्चे तेल की अपेक्षाकृत नरम कीमतों ने घरेलू मुद्रास्फीति पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद की। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के चलते ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत को विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला के नए अवसर मिले । इन परिवर्तनों ने अल्पकालिक अस्थिरता जरूर बढ़ाई, लेकिन दीर्घकाल में विविधीकृत पोर्टफोलियो के लिए लाभकारी सिद्ध हुए, खासकर रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में ।



2026 की संभावनाएँ-आगे की राह
समग्र रूप से देखें तो 2025 ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है । तेज जीडीपी वृद्धि, सहायक मौद्रिक नीति, लक्षित सरकारी प्रोत्साहन और घरेलू निवेशकों की सक्रिय भागीदारी ने बाजारों को स्थिरता प्रदान की । 2026 की ओर बढ़ते हुए, अवसंरचना, विनिर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा पर केंद्रित संतुलित निवेश रणनीति दीर्घकालिक और स्थिर प्रतिफल देने में सहायक हो सकती है।
(आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग  
चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ।)

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