पुलिस की आत्म पहचान और सामाजिक छवि
- प्रो. नंदलाल
पुलिस का नाम सुनते ही लोगों के अंदर नकारात्मक और क्रूर छवि उभरकर सामने आती है। जबकि पुलिस लोगो की रक्षा और सुरक्षा के लिए ही बनाई गई है वरना पुलिस की जरूरत ही क्या है। समाज और समाज में रहने वाले लोगों के लिए एक तरफ समाज ने ही प्रतिमान और मानक बनाया है तो दूसरी तरफ जातियों और संप्रदायों ने भी अपने धर्म कर्म के हिसाब से नियम बना रखे हैं।और तो और हमारे संविधान में भी लोगों और समूहों के लिए आचरण और मर्यादा के नियम बनाए गए हैं।
कानून ने अपने नियम बना रखे हैं। तो जब इतने ढेर सारे नियम, कानून, व्यावहारिक मापदंड बना रखे हैं तो लोग उन नियमों का पालन क्यों नहीं करते और क्यों उन मानकों को तोड़ने में अपनी शान समझते हैं। पुलिस कोई यंत्र तो नहीं जो मशीन की तरह कार्य करे,आखिरकार वह भी तो एक आदमी ही है। आदमी है तो गलतियां तो उससे भी हो सकती हैं।हम यह क्यों समझते हैं कि वे गलती करते हैं।
इतनी बड़ी जनसंख्या को सम्हालने के लिए मुट्ठी भर पुलिस लगा दी जाती है। उनके कंधे पर संरक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।जनता है जिनके बीच भेड़िए छिपे रहते हैं। बदमाशी, लूट, छीनैती, भ्रष्टाचार, शोषण, अपराध, मर्डर, तस्करी, वेश्यावृत्ति, बलात्कार, मारपीट, एक्सीडेंट, अनाथ, मेला, स्नान सभी जगह पुलिस को पहुंचना है और समस्या का निपटान भी करना है। मै स्वतः कभी कभी पुलिस के व्यवहार से विचलित हुआ हूं। चित्रकूट में हर अमावस्या को बड़ी भीड़ होती है। चूंकि यह स्थान मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का बॉर्डर है अतः दोनों राज्यों की पुलिस की मेला ड्यूटी लगाई जाती है। भीड़ अधिक होने और सड़को के अभाव के कारण लोकल जनता और नौकरी शुदा लोगों के आने जान मे ढेर सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कभी कभी पुलिस बिना भीड़ के भी इतनी बैरिकेटिंग कर देती है कि समय से नौकरी पर न पहुंच पाने पर पुलिस पर ही खीज निकलती है और पुलिस वालों की आक्रामक भाषा का शिकार होना पड़ता है।
ऐसा एक दो बार की बात नहीं है। हर महीने अमावस्या आती है और हर महीने इस स्थिति से रूबरू होना पड़ता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस वाला गलत है। हम अपनी सहूलियत देखते हैं वे अपनी सहूलियत देखते हैं।थोड़ा पुलिस के नौकरी कंडीशन को समझिए। हम मेला में जाते है या तो पैदल होते हैं या दो पहिया वाहन पर होते हैं या चार चक्के में बैठे होते हैं। आगे बढ़ने की जिद्द करते हैं और वह भीड़ की स्थिति का आकलन करता है। हम जहां चाहें रुक लें, बैठ लें पर पुलिस लगातार बारह घंटे खड़ी रहती है। तेज गर्मी हो, कंपकपाने वाली ठंड हो या मूसलाधार बारिश हो उसे तो ड्यूटी देनी ही है। खाने का नियत समय नहीं, सोने का समय नहीं, बच्चों से मिलने की छुट्टी नहीं, रविवार को भी ड्यूटी, साप्ताहिक कोई अवकाश नहीं। बेटा बेटी की शादी पर छुट्टी मंजूर नहीं। एक पुलिस वाला किस तरह अपनी ड्यूटी का फर्ज निभाता है सच्चे पुलिस से पूछिए। यदि किसी व्यक्ति का आहार विहार निश्चित नहीं है तो उसे मनोदैहिक बीमारियां ऐसे भी घेर लेती हैं।उनका आक्रामक और कठोर होना तो कुछ भी नहीं है। बीपी उन्हें है, शुगर उन्हें है, हार्ट रोग उन्हें है, डिप्रेशन उन्हें है, फ्रस्ट्रेशन उन्हें है, स्ट्रेस उन्हें है। कौन सी विकृति उन्हें नहीं है? ऐसे में बिना किसी अवकाश के लगातार ड्यूटी देना सामान्य मानव के बस की बात नहीं है। भगवान उनके शरीर को ऐसा बना देते हैं कि वे इन समस्याओं को चीरते हुए भी अपना कर्म करते हैं।
अब बात आती है उनके सामाजिक छवि की तो आपको समझना चाहिए कि उनकी सैलरी बहुत कम होती है। अधिकारी वर्ग को छोड़ दें तो उनका सामान्य खर्च वेतन से नहीं चल सकता। उनमें शिक्षा का स्तर इंटरमीडिएट से पीएचडी तक है।उनमें भी बहुत क्वालीफाइड लोग कार्यरत हैं। एक आईपीएस जो इतना श्रम करके इस पद तक पहुंचा है अपने जीवन के सुनहले समय में जी तोड़ परिश्रम करके इस सर्विस को प्राप्त किया है पर कोई भी नेता उसको कमतर करके ही देखता है। कोई अधिकारी या मंत्री का आगमन होता है तो उस आईपीएस की दुर्दशा देखिए किस कदर उसे उनके आगे पीछे दौड़ लगानी पड़ती है। पर उसका सामाजिक प्रत्यक्षण बड़ा नकारात्मक होता है। कोई उसे पुलिस वाला गुंडा कहता है तो कोई उसे करप्ट अधिकारी बोलता है। पुलिस का मतलब चोर होता है जिसके संरक्षण में अपराध होते हैं।यह उसकी छवि होती है। पर जनता और समाज अपनी बुराइयों को नहीं देखता और अपराध में संलिप्त रहता है।
पुलिस और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। पुलिस किसी भी कीमत पर समाज को अपराधमुक्त नहीं कर सकती क्योंकि उसकी छवि समाज में नकारात्मक अर्थात दंड देने वाली है। जब तक यह छवि पुरस्कार और दंड के बीच नहीं आती तब तक इस छवि का बदलना मुश्किल है। लेकिन जब तक समाज की नजर पुलिस को मानव के रूप में नहीं देखेगी तब तक पुलिस की परेशानियों को समाज नहीं समझ पाएगा।पुलिस नियमावली में आवश्यक सुधार नहीं होगा तो स्थिति और भी खराब हो सकती है। पुलिस को भी रेस्ट की जरूरत है भले ही वह साप्ताहिक हो अन्यथा उसके अंदर की विकृतियां मनोदैहिक से मानस्ताप में परिवर्तित हो सकती है।(महात्मा गांधी ग्रामोदय यूनिवर्सिटी चित्रकूट, सतना)
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