सोशल मीडिया: अंकुश जरूरी
राजीव त्यागी 
आधुनिक युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज का समाज सोशल मीडिया के बिना अपनी दैनिक गतिविधियों की कल्पना भी नहीं कर सकता। यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और एक्स (पूर्व ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म ने सूचनाओं के आदान-प्रदान को अत्यंत सरल और त्वरित बना दिया है। 
जहाँ एक ओर सोशल मीडिया ज्ञान, संवाद, रोजगार और जागरूकता का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है, वहीं दूसरी ओर इसके दुष्परिणाम भी उतने ही गंभीर और भयावह होते जा रहे हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया आज वरदान कम और अभिशाप अधिक सिद्ध होता प्रतीत हो रहा है। आज वृद्ध, युवा और बालक—सभी वर्गों के लोग अपने समय का बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर बिताने लगे हैं। पारिवारिक संवाद, सामाजिक मेल-जोल और वास्तविक जीवन की संवेदनाएँ धीरे-धीरे आभासी दुनिया में सिमटती जा रही हैं। 


बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह मोबाइल फोन आ गए हैं और युवा वर्ग रील्स व लाइक्स की दुनिया में स्वयं को खोता जा रहा है। यह स्थिति समाज के मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत चिंताजनक है। अश्लीलता की सभी सीमाएँ सोशल मीडिया ने पार कर दी हैं। खुलेआम आपत्तिजनक सामग्री परोसी जा रही है, जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव किशोरों और युवाओं के मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा है। नैतिक मूल्यों का क्षरण और मानसिक विकृति इसी का प्रत्यक्ष परिणाम है।
 इतना ही नहीं, सोशल मीडिया आज मिथ्या, भ्रामक और फेक समाचारों का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। बिना किसी पुष्टि के झूठी खबरें फैलाना एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है। इससे समाज में भ्रम, अविश्वास और तनाव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। चिंता का विषय यह भी है कि देश-विरोधी गतिविधियां और राष्ट्र की एकता-अखंडता को चुनौती देने वाली सामग्री सोशल मीडिया के माध्यम से बड़े सुनियोजित ढंग से प्रसारित की जा रही है। 


यदि समय रहते सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण और सेंसरशिप नहीं लागू की गई, तो आने वाला भविष्य अत्यंत भयावह हो सकता है।  अतः आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखे और स्पष्ट व प्रभावी नियम बनाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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