- ललिता जोशी
आधुनिक और शिक्षित मानव के पूर्वज बंदर ही थे । इनका मनुष्यों के साथ आज भी सह अस्तित्व है । बंदर की फितरत है जिस पर दिल आया तो फिर उसे वो झपट लेता है । ये गुण मनुष्य में भी है । मनुष्य ने अपने विकास और उन्नति के लिए उनके निवास को उजाड़ा और अपनी बस्तियाँ बसा ली । बड़ी -बड़ी सड़कें, हाइवे, सुरंग, बाईपास बना दिये ताकि उसे आवागमन की सुविधा मिल सके और यात्रा करना आसान हो।
मनुष्य ने अपने लिए तो सुविधा जुटा ली लेकिन बेचारे बंदरों का क्या । अपना पेट भरने के लिए उन्होने अपना रुख इंसानी बस्तियों की और किया । उनके हाथ जो पड़ा उन्होने वो खाया भी और बर्बाद भी किया । घरों में घुस कर विकास की निशानी फ्रिज को खोल कर उस में से जो पसंद आया उसे निकाल कर खा लिया । कुछ नहीं मिला तो पानी की टंकियों को खोल उसमें उधम मचाया और नहाया बाकी का बचा पानी तो हो गया बर्बाद। मनुष्य में अपने इस पूर्वज की बहुत सी विशेषताएं हैं। एक कहावत भी है कि “बाप पे पूत ,नस्ल पे घोड़ा ,ज्यादा नहीं तो थोड़ा -थोड़ा “। वंशानुगत गुण तो आते ही हैं । विश्व के सभी मनुष्यों में अपने पूर्वजों के गुण हैं । बंदर सभी देशों में पाये जाते हैं । इनपर दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल भी किए जाते हैं । सभी देश बंदरों का प्रयोग इस काम के लिए करते हैं । इसीलिए उजाडू बंदरों का मनुष्य के साथ नाता बहुत प्रगाढ़ है । आदमी के अपने पूर्वज से कुछ गुण भी मेल खाते हैं ।
ऐसे ही एक विदेशी बंदर का दिल तेल पर आया हुआ है । जहां उसने देखा तेल कर दिया वहीं पर कर दिया खेल । ये वो बड़ा और मोटा बंदर है जो अपनी दादागिरी अपने से छोटे बंदरों पर चलता है । उन्हें अपनी मर्जी से कुछ करने नहीं देता। उनके हाथ का खाना भी छीन लेता है और उन्हें घुड़की भी देता है । अजी अब इन बंदर महाशय का दिल तेल पर आ गया है । पृथ्वी के किसी कोने में तेल होने का पता चलते ही ये बड़ा बंदर बाकियों को लड़वाता रहता है कि उसका आधिपत्य बना रहे और उनका तेल इस्तेमाल कर ले । ये बंदर ऐसे ही लड़ाई लगवा कर अपना लड़ाइयों के काम आने वाला माल बेचता है। ताकि बंदर महाशय की दूकानदारी चलती रहे और दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होती रहे । इस बंदर को सिर्फ अपने पेट और अपनी रोटी की पड़ी रहती है ।
ये बंदर कहानीवाला बंदर नहीं है जिसकी कहानी हम अपने बचपन में सुना करते थे कि वो बिल्लियों की लड़ाई में उनकी रोटी खा जाता है और जैसे ही ये बंदर बिल्लियों की पूरी रोटी खा जाता है वैसे ही उनकी लड़ाई भी खत्म हो जाती है । अपना ये आधुनिक पढ़ा-लिखा ट्रेनड बंदर इतना शातिर है कि सब की रोटी खाकर भी उसका पेट नहीं भरता न ही नियत । वैसे ये अन्य बंदरों को अपने साम्राज्य में काम -धाम पर रखता है और जब मर्जी हो वो अपने कामगारों को घुड़की देता है । उनकी जान सांसत में डाल दो । पढ़ाई लिखाई के लिए जो आए उन पर तगड़ी फीस थोप दो । सब को परेशान करने के 1001 तरीके इजाद कर रखे हैं इस बंदर महाशय ने ।
बंदर तो बंदर ही ठहरा उसका दिल कब किस चीज पर आ जाए । आजकल इसे तेल पीने का शौक चर्राया है । जहां देखा तेल वहीं वो फैल जाता है । इसके लिए वो कुछ भी करेगा । ये बंदर साम दाम दंड भेद की नीति का विशेषज्ञ है । आदत इतनी गंदी की चोर को कहे चोरी कर और दुकानदार को कहे सावधान हो जाओ क्योंकि चोर चोरी करने आ रहे हैं । क्या बंदर खोपड़ी है भई । मुंह में राम बगल में छुरी के चरित्र वाला है ये बंदर ।
बंदर को आजकल तेल में रुचि हो गई है । तेल के लिए वो ऐसा जाल बिछाता है कि वो तेल वालों को रातों -रात बंधक बना कर उठा ले जाते हैं और तेलवालों पीआर अनाप-शनाप आरोप लगा दिये जाते हैं । किसी पर बाइओलोजिकल हथियार का आरोप तो किसी पर परमाणु बंब का आरोप लगा दो । जब तेली आपस में मिल गए तो बंदर की हो गई ऐसी की तेसी । इस उत्पाती बंदर को देख आ गई कहावत याद तेली का तेल जले मशालची के जी जले। अरे इस बंदर को कोई बताए की ज्यादा तेल सेहत के लिए हानिकारक होता है ।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)





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