नकली दवाओं पर सख्ती जरूरी
इलमा अज़ीम
मानव जीवन की रक्षा में औषधियों की भूमिका किसी संजीवनी से कम नहीं है, परंतु जब मुनाफे की अंधी दौड़ में ये औषधियां ही जहर बन जाएं, तो समाज की नींव हिलने लगती है। भारत, जिसे अपनी गुणवत्ता और सामर्थ्य के कारण दुनिया की ‘फार्मेसी’ कहा जाता है, उसके लिए यह संकट दोहरा है।
यह हमारी अंतरराष्ट्रीय साख को भी धूमिल करता है। समय की मांग है कि कानून की शक्ति और तकनीक की पारदर्शिता आपस में हाथ मिलाकर एक ऐसा अभेद्य तंत्र विकसित करें, जहां अपराधी के लिए कोई छिद्र शेष न रहे। वर्तमान में, धारा 27(ए) के अंतर्गत कड़े प्रावधान किए गए हैं। यदि किसी नकली दवा के सेवन से व्यक्ति की मृत्यु होती है या उसे गंभीर शारीरिक क्षति पहुंचती है, तो दोषी को कम से कम 10 साल की कड़ी सजा का प्रावधान है, जिसे अपराध की गंभीरता के आधार पर आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
न्यायपालिका ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी खामियों के कारण कोई अपराधी कानून की पकड़ से बाहर न निकल सके। कानून का यह प्रहार तब और प्रभावी हो जाता है जब इसे डिजिटल नवाचारों का समर्थन मिलता है। आज का दौर डेटा और पारदर्शिता का है, जहां ‘ट्रैक एंड ट्रेस’ तकनीक इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है। कागजी दस्तावेजों के हेरफेर के दिन अब लद चुके हैं और सरकार द्वारा शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड अनिवार्य करना इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
नकली दवाओं के जाल को काटने के लिए हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि पक्का बिल मात्र एक रसीद नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है, जो कानूनी लड़ाई और मुआवजे के लिए प्राथमिक सबूत बनता है। दवा खरीदते समय पैकेजिंग की बारीकियों जैसे धुंधली छपाई, गलत स्पेलिंग या टूटी सील पर पैनी नजर रखें। भारी छूट के लालच में न आएं। सतर्कता ही आपके स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों की रक्षा का एकमात्र मार्ग है।





No comments:
Post a Comment