धार्मिक और संवैधानिक नियमों के विरोधाभास
- डॉ. नंदलाल
अजीब समय आ चुका है, जहां हम सनातन का दंड लिए घूम-घूमकर सनातन धर्म की महिमा का गुणगान कर रहे हैं और उसकी आड़ में हम अपने स्वार्थ की रोटी सेंक रहे हैं। यह कैसा विरोधाभास है कि कबीर दास जी लिखते हैं कि
संत न छोड़े संतई कोटिक मिले असन्त।
मलय भुवांगही बेधिया शीतलता न तजन्त
करोड़ असंतों की संगति हो जाने पर भी संत अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता।ठीक वैसे जैसे बहुत सारे सर्पों द्वारा चंदन के वृक्ष को लपेटे रहने के बाद भी चन्दन की खुशबू और उसकी शीतलता पर जहर का कोई असर नहीं होता ठीक वैसे ही दुष्टों की संगति का संत की सज्जनता पर कोई असर नहीं होता।
किंतु आज समाज में न जाने कितने ऐसे संत आ गए हैं जिनको आध्यात्मिकता में रुचि न होकर राजनीति और स्वार्थ पूर्ति में रुचि बढ़ गई है।एक ताजा विवाद चल रहा है जिसमें प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य और उनके शिष्यों को स्नान करने से रोक दिया ।क्या हुआ क्या नहीं हुआ उस विवाद से विशेष कोई अर्थ यहां नहीं है। शंकराचार्य नाराज हैं। वह एक संत हैं और सर्व प्रतिष्ठित धर्म पद पर आसीन हैं।
ऐसे प्रकरण जब आते हैं प्रायः यह देखा जाता है कि धर्म ध्वजवाहक आमने-सामने आ जाते हैं। जैसे संसद में कोई बात आती है तो पक्ष और विपक्ष संसद और सड़क पर आमने सामने हो जाते हैं। संसद में तो राजनीतिक लोग होते हैं पर धार्मिक संत तो बहुत अधिक ज्ञानी होते हैं। समाज, राष्ट्र और लोगों को उपदेश देते हैं, ज्ञान बांटते हैं। पर जब कोई धार्मिक बात आती है तो वे आपस में लड़ बैठते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि या तो हमारे ज्ञान परंपरा में कोई विरोधाभास है या फिर ये संत सामान्य गृहस्थों की तरह ही हैं।
यदि धार्मिक धर्मांधता ऐसे चलती रही तो सनातन का क्या होगा जो अपने को सर्व प्राचीन धर्म की दर्जा में खड़ा करता है जो विश्वबन्धुत्व की बात करता है,जो सर्वे भवन्तु सुखिन की बात करता है। जो संगछध्वं की बात करता है। एक दूसरे पर छींटाकशी करके अपने को सबसे अधिक ज्ञानी होने का दंभ भरता है। कौन शंकराचार्य है कौन नहीं है ये तो शंकराचार्य लोग ही जाने। हम लोग रोज टीवी में बहसों को सुनते हैं। एक पक्ष शंकराचार्य और ब्राह्मणों के अपमान पर अपनी पूरी बहस को केंद्रित रखता है तो दूसरा पक्ष जो संत नहीं है वह भी शंकराचार्य पर आपत्ति उठाता है।
सनातन धर्म की महत्ता और हिंदुत्व के अस्तित्व को देखा जाय तो दोनों पर कहीं भी समझौता का तो प्रश्न ही नहीं है पर हिंदुत्व के आंतरिक कलह इस पर प्रश्न खड़ा करते हैं और परिणाम के रूप में श्री रामचरित मानस और वेदों, मनुस्मृति की प्रतियां जला देना किस व्यवहारात्मक स्वरूप को प्रदर्शित करता है। कबीर, रहीम, नानक, रैदास, तुलसीदास, बाल्मीकि ने किस विभाजन को आगे बढ़ाया था। नहीं उन्होंने समाज को जोड़ने की बात की थी न तो वे शंकराचार्य थे नहीं किसी मठ के महंत थे। पर जो अमिट छाप उन्होंने समाज पर छोड़ा है वह आज भी उतना ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।
कबीर दास के बारे में कहा जाता है कि
मसी कागद छुओ नहीं कलम गहि नहि हाथ।
ऐसा संत अमर है। किसी की आलोचना नहीं अपने ज्ञान का प्रमाद नहीं। सभी को एक नजर से देखने वाला वह सभी संतों से ऊपर है। जनता के लाभार्थ परमात्मा के प्रति प्रेम जगाने वाला वह संत क्या आज के संतो की तरह है।आज गृहस्थ और समाज मौन है। पर मेला प्रशासन की अपनी भी जिम्मेदारी है। पिछले महाकुंभ में हुई हजारों मौतों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। उसकी जिम्मेदारी रहती है कि स्नान पर्व सकुशल निपट जाय। पर उसके लिए सभी को प्रोटोकॉल पहले से बता दिया जाना चाहिए कि सभी को किस तरह स्नान करना है।
चाहे जो हो हिन्दू धर्म में विरोधाभास खुलकर सामने आ गया है जहां मेला प्रशासन शंकराचार्यों को मार्गदर्शन दे रहा है। इसका अर्थ यह लगाया जाना चाहिए कि शासन और प्रशासन तंत्र के सामने धर्माचार्यों के कोई भी नियम मान्य नहीं हैं। उन्हें भी प्रशासन की बात माननी होगी। यदि प्रशासन के नियम उन पर बाध्यकारी हैं तो फिर आम आदमी की क्या विसात है। और फिर हम धर्माचार्यों की और हिन्दू रीति रिवाज में क्यों आस्था रखें। यह एक मौलिक प्रश्न उपस्थित होता है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)





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