आर्थिक तंगी और अधूरा इलाज
राजीव त्यागी
इस देश में स्वास्थ्य सेवाएँ हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है. यहाँ पर करोड़ों लोग गाँवों और कस्बों में रहते हैं जहाँ बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ तक ठीक से उपलब्ध नहीं हैं। शहरों में आधुनिक अस्पताल तो हैं लेकिन वहाँ इलाज इतना महँगा है कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सिर्फ एक सपना ही बनकर रह जाता है।
हाल ही में आई एक रिपोर्ट ने इस स्थिति की भयावहता को उजागर कर दिया है कि देश में लगभग 42 प्रतिशत मरीज आर्थिक तंगी के कारण इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं और इनमें से 35 प्रतिशत मरीज महज़ छह महीनों के भीतर मौत का शिकार हो जाते हैं। यह आँकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि हमारी पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह भी है। बीमारी इंसान के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी होती है।
स्वस्थ शरीर ही खुशहाल जीवन की नींव है लेकिन जब बीमारी आती है तो वह न केवल शरीर को कमजोर करती है बल्कि परिवार की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति को भी हिला देती है. किसी भी परिवार के लिए यह सबसे कठिन स्थिति होती है जब उन्हें अपने ही प्रियजन के जीवन और पैसों के बीच चुनाव करना पड़े. इलाज चल रहा हो लेकिन पैसे खत्म हो जाएँ और डॉक्टर या अस्पताल वाला कहे कि अब बिल चुकाए बिना इलाज आगे नहीं बढ़ सकता, तब मजबूर परिवारों को मरीज को बीच रास्ते से घर ले जाना पड़ता है.यही वह दर्दनाक क्षण है जो हजारों परिवार हर साल झेलते हैं गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार इस त्रासदी के सबसे बड़े शिकार हैं।
अमीरों के पास इतना पैसा होता है कि वे किसी भी अस्पताल का खर्च उठा सकते हैं लेकिन गरीब परिवारों के पास अक्सर ऐसा कोई सहारा नहीं होता। कभी जमीन बेचनी पड़ती है, कभी कर्ज लेना पड़ता है, कभी रिश्तेदारों से मदद माँगी जाती है। सरकार ने आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ शुरू की हैं ताकि गरीबों को पाँच लाख रुपये तक का बीमा कवर मिल सके लेकिन वास्तविकता यह है कि निजी अस्पताल अक्सर इन योजनाओं को मानते ही नहीं या फिर मरीज को योजना के नाम पर टाल देते हैं. बीमा कंपनियाँ भी कई शर्तों और नियमों के नाम पर पूरा पैसा देने से बचती हैं. ऐसे में आम आदमी को बीमा होने के बावजूद पूरा लाभ नहीं मिल पाता।





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