यूजीसी नियमों से मचा भूचाल: पिस रही शिक्षा
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर ऐसे संवेदनशील चौराहे पर खड़ी है, जहाँ “समानता”, “न्याय” और “सुरक्षा” जैसे शब्दों के अर्थ को लेकर गहरी बहस छिड़ गई है। 13 जनवरी 2026 को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा अधिसूचित उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन विनियम को आधिकारिक रूप से जाति आधारित भेदभाव समाप्त करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया।
आयोग का तर्क है कि पिछले पाँच वर्षों में जातिगत शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और रोहित वेमुला तथा पायल तड़वी जैसे मामलों ने संस्थानों की संवेदनहीनता को उजागर किया है। इसी आधार पर हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में समान अवसर केंद्र, समानता समिति, 24 घंटे की हेल्पलाइन और संस्थान प्रमुखों की सीधी जवाबदेही जैसे कड़े प्रावधान किए गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करेगी, या फिर समानता के नाम पर एक नई असमानता को जन्म देगी।
नए नियमों की मूल संरचना ही सबसे बड़ा विवाद बन गई है। जातिगत भेदभाव की परिभाषा लगभग पूरी तरह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दी गई है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक यदि किसी प्रकार के भेदभाव का सामना करें, तो उनके लिए कोई स्पष्ट और समान तंत्र मौजूद नहीं है। पुराने 2012 के नियमों में झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान था, जिसे नए नियमों में हटा दिया गया है, जिससे जांच प्रक्रिया में संतुलन बना रहता था। नए नियमों में इस प्रावधान को हटाना कई लोगों को चिंतित कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि इससे शिकायतें न्याय का साधन कम और दबाव का हथियार अधिक बन सकती हैं। समानता समिति में सामान्य वर्ग का अनिवार्य प्रतिनिधित्व न होना भी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यही कारण है कि कई लोग इसे संविधान में निहित समानता और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध मान रहे हैं।
यह असंतोष अब केवल अकादमिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक भूचाल में बदल गया है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं और पदाधिकारियों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दिया, जिसमें उन्होंने यूजीसी नियमों को 'ब्लैक लॉ' करार देते हुए सामान्य वर्ग को असुरक्षित बताया और शंकराचार्य के साथ कथित दुर्व्यवहार का भी जिक्र किया; इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में सस्पेंड कर विभागीय जांच शुरू कर दी।
लखनऊ में युवा मोर्चा और किसान मोर्चा के अनेक नेताओं सहित कई बीजेपी पदाधिकारियों ने सामूहिक इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व को चेतावनी दी और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गईं। सामाजिक माध्यमों पर प्रसिद्ध हस्तियों की टिप्पणियों ने भावनात्मक स्वर को और तीखा कर दिया। आलोचकों का आरोप है कि अन्य पिछड़ा वर्ग को नियमों में प्रमुखता देकर राजनीतिक लाभ साधने का प्रयास किया गया, जबकि सामान्य वर्ग को हाशिए पर धकेला जा रहा है।
राजनीतिक हलचल के समानांतर, देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया है। दिल्ली स्थित आयोग मुख्यालय के बाहर सामान्य वर्ग के छात्रों का धरना यह स्पष्ट संकेत देता है कि विरोध भेदभाव रोकने के उद्देश्य के खिलाफ नहीं, बल्कि एकतरफा व्यवस्था के खिलाफ है। “कैंपस में अराजकता नहीं, समानता चाहिए” जैसे नारे छात्रों की मानसिक पीड़ा को उजागर करते हैं।
अखिल एबीवीपी (बीजेपी से जुड़ा) और एनएसयूआई (कांग्रेस से जुड़ा) जैसे वैचारिक रूप से अलग संगठन भी इस मुद्दे पर एक मंच पर दिखाई दिए, जो अपने आप में असाधारण है। कई छात्र संघों ने औपचारिक पत्र लिखकर नियमों को वापस लेने या संशोधित करने की माँग की है। छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि अनुपालन का अत्यधिक दबाव संस्थानों को रक्षात्मक बना देगा, जहाँ झूठी शिकायतों से बचने के लिए सामान्य वर्ग को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। इसका सीधा असर पढ़ाई, शोध और कैंपस के मानसिक माहौल पर पड़ रहा है।
विवाद के बढ़ने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने भरोसा दिलाया कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा और कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने आयोग और सरकारों को निष्पक्ष क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी। लेकिन आलोचक पूछते हैं कि जब नियमों की संरचना ही असंतुलित हो, तो केवल आश्वासन से क्या बदलेगा। उनकी माँग है कि झूठी शिकायतों पर सख्त दंड का प्रावधान जोड़ा जाए, भेदभाव की परिभाषा सभी वर्गों के लिए समान हो और समानता समिति में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया जाए। आयोग का कहना है कि बढ़ती शिकायतों ने कठोर कदम आवश्यक बना दिए थे, लेकिन विरोधी मानते हैं कि आँकड़ों के पीछे के कारणों की गहन जाँच के बिना बनाए गए नियम समस्या को सुलझाने के बजाय बढ़ा सकते हैं।
यह विवाद केवल एक नियमन का नहीं, बल्कि भारतीय समाज की दिशा का प्रश्न बन गया है। समानता का अर्थ यह नहीं कि एक वर्ग की सुरक्षा के नाम पर दूसरे को भय और असुरक्षा में डाल दिया जाए। उच्च शिक्षा में समावेशिता निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन वह संतुलन, पारदर्शिता और पारस्परिक विश्वास के बिना संभव नहीं। यदि नियम भय और अविश्वास का वातावरण बनाते हैं, तो वे अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। आयोग को चाहिए कि वह विरोध को हठधर्मिता से नहीं, बल्कि संवाद और संशोधन से संबोधित करे। सुप्रीम कोर्ट में विनीत जिंदल और मृत्युंजय तिवारी जैसी याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, जिनमें नियमों को असंवैधानिक और एकतरफा बताया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इस मामले में निर्णायक होगा, लेकिन उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा केवल कानून से नहीं, विश्वास से चलती है। असल प्रश्न यही है कि क्या ये नियम भेदभाव की दीवारें गिराएँगे या नई दीवारें खड़ी करेंगे। इसका उत्तर आने वाले समय में भारतीय उच्च शिक्षा और सामाजिक सद्भाव की दिशा तय करेगा।





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