कड़े हों प्रतिबंध
राजीव त्यागी 

सोशल मीडिया के खतरों, उसकी भ्रामक सामग्री और उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाना अत्यावश्यक है। भारत की युवा पीढ़ी में अपार ऊर्जा और क्षमता है। यदि यह ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित की जाए, तो यही युवा समाज में परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते हैं। परंतु यदि इन्हें अश्लीलता और सतही मनोरंजन के बहाव में छोड़ दिया गया, तो समाज को भविष्य में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 
शिक्षण संस्थान हमारे भविष्य के शिल्पकार हैं, इसलिए इनका वातावरण पवित्र, अनुशासित और संस्कृति-सम्मत और भारतीय संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। आधुनिकता जरूरी है, परंतु आधुनिकता का अर्थ कभी भी असंयम या अश्लीलता नहीं होता। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों, अपने मूल्यों और अपनी सांस्कृतिक चेतना को संभालते हुए आगे बढ़ें। यदि समय रहते समाज ने सजगता नहीं दिखाई, तो यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कृति की जड़ों को कमजोर कर सकती है। परंतु यदि सामूहिक चेतना जागृत हो, तो यही चुनौती एक अवसर में बदल सकती है, एक ऐसा अवसर, जहां हम अपनी युवा पीढ़ी को आधुनिकता और संस्कृति के संतुलन के साथ आगे बढऩे का मार्ग दिखाकर सुसंस्कारित बना सकें। 


यही भारत के शिक्षण संस्थानों का वास्तविक उद्देश्य भी है और वर्तमान समाज की आवश्यकता भी। आज मोबाइल डेटा सस्ता है, इंटरनेट सर्वसुलभ है और स्मार्टफोन हर उम्र के हाथ में है। ऐसे में सोशल मीडिया पर परोसी जाने वाली अश्लीलता का प्रभाव सीधे किशोरों और युवाओं के मनोविज्ञान पर पड़ रहा है। सोशल मीडिया के दो चेहरे हैं। एक ओर यह सूचना, संवाद, रचनात्मकता और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम है। विश्व के बड़े मीडिया बाजारों में सोशल मीडिया विज्ञापनों ने टीवी को पीछे छोड़ दिया है। लोग इससे ज्ञान, अपडेट, व्यापारिक अवसर और सामाजिक नेटवर्किंग प्राप्त करते हैं। परंतु इसके दूसरी ओर अंधेरा है, फर्जी खबरें, नफरत फैलाने वाली सामग्री, मिथ्या वीडियो, और सबसे अधिक, अश्लीलता का बेतहाशा प्रसार। 
फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी साइटें रील्स और शॉट्र्स को बढ़ावा देती हैं और इनके क्रिएटर्स को पैसे देकर सामग्री अपलोड करने के लिए प्रेरित भी करती हैं। किशोर उम्र के बच्चे जब ऐसे वीडियो देखते हैं, तो वे अनजाने में इनके अनुकरण की ओर बढ़ते हैं। शैक्षणिक परिसरों में अश्लील डांस का बढ़ता चलन इसी डिजिटल प्रभाव का प्रत्यक्ष परिणाम है। यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या हमारे नीति-निर्माता और प्रशासन इस गहरी समस्या को समझ रहे हैं? सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67-ए, 67-बी और 67-सी ऑनलाइन अश्लीलता पर रोक लगाती हैं, और कठोर सजा का प्रावधान भी है, परंतु अमल के अभाव में यह कानून कागजों तक सीमित होकर रह जाता है।


 सोशल मीडिया कंपनियां अपने मुनाफे के लिए ऐसी सामग्री को हटाने में ढील दिखाती हैं, और सरकारें चुनावी व्यस्तताओं में ऐसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों पर ध्यान नहीं दे पातीं। इस संकट का समाधान तभी संभव है जब परिवार, शिक्षण संस्थान, समाज और सरकार, सभी मिलकर एक सार्थक दिशा की ओर कदम बढ़ाएं। विद्यालयों और कॉलेजों को सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित अवश्य करना चाहिए, किंतु यह प्रोत्साहन भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।

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