आखिर कब मिलेगी निजात

 इलमा अजीम 

कभी सुबह की हवा इतना हल्का स्पर्श देती थी कि सिर्फ एक लंबी सांस ही पूरे दिन की खुशी के लिए काफी होती थी। लेकिन आज वही हवा खिडक़ी तक आते-आते डर पैदा करती है, कि पता नहीं इसमें ताजगी होगी या जहर। अब सवाल हवा से नहीं, हमसे है : कब खुल के सांस ले सकेंगे हम? हर साल 2 दिसंबर आकर धीरे से कहता है : हवा को हल्के में मत लो, यह जीवन का पहला वाक्य है। 


दिल्ली इस सर्दी में फिर सांस रोक देने वाले मौसम से गुजरी। कई दिनों तक एक्यूआई 350-450 पर रुका रहा। बच्चों की खेलने की जमीनें बंद कमरों में सिमट जाती हैं, बुजुर्गों की सुबह की सैर मोबाइल की स्क्रीन पर एक्यूआई देखकर रद्द हो जाती है, और खिड़कियां हवा के डर से बंद रहती हैं। 


दिल्ली, हिमाचल और चंडीगढ़- तीनों ईवी नीति को तेजी से अपना रहे हैं। मनाली-रोहतांग मार्ग पर इलेक्ट्रिक बसें, धर्मशाला में ई-ऑटोज, चंडीगढ़ के चार्जिंग स्टेशन और दिल्ली की तेजी से बढ़ती ई-कारें आने वाले समय में हवा को बोझ से राहत देंगी। 


दिल्ली की धुंध, हिमाचल की ठंडक, चंडीगढ़ की समझ और दिसंबर की सीख- ये सब मिलकर हमें एक ही बात सिखाते हैं कि हवा की कहानी हमारी सोच से शुरू होती है और हमारी जिम्मेदारी पर खत्म। जब मन बदलेगा, सोच बदलेगी, और आदतें बदलेंगी- तभी हवा भी बदलेगी। हवा किसी सरकार की नहीं। हम सभी को इसकी गंभीरता को समझना होगा और अपने स्तर से प्रयास करने होंगे तभी हम खुली हवा में सांस ले सकेंगे।

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