इलमा अज़ीम
जैव विविधता मानव जीवन और आर्थिक संपन्नता का आधार है। प्रकृति जैव विविधता के माध्यम से ही सृष्टि की एक दूसरे पर आधारित व्यवस्था को चलाती है। हिमालय पारिस्थितिकी तंत्र करोड़ों एशिया वासियों के लिए आजीविका और रोजगार के साधन उपलब्ध करवाता है। भारतीय हिमालय वनस्पति, वन्य प्राणी, ग्लेशियर, बर्फ, पारंपरिक ज्ञान, और पर्वतीय कृषि विविधता के लिए महत्वपूर्ण है। गंगा और सिंध के मैदानों को हरा भरा बनाने वाली नदियां हिमालय से ही निकलती हैं।
पर्यावरणीय दृष्टि से हिमालय बहुत संवेदनशील है। वनस्पति और वन्यप्राणी विविधता स्वस्थ वनों के बिना संभव ही नहीं है। बढ़ती आबादी, वन उत्पादों की बढ़ती मांग, और प्रबन्धन की कमियों के चलते वन संसाधन और वनों पर आधारित जैव विविधता घटते जा रहे हैं, जिससे हिमालय परिस्थिति तंत्र द्वारा दी जाने वाली अनेक पर्यावरणीय सेवाएं भी खतरे में पड़ती जा रही हैं। हिमालय द्वारा दी जाने वाली मुख्य पर्यावरणीय सेवाएं निम्न हैं : फल, चारा, ईंधन, खाद, रेशा और दवाई, चरागाह और अन्य गैर इमारती वन उत्पाद प्रदान सेवाएं। जलवायु नियमन, वायु की गुणवत्ता नियमन, पानी की मात्रा और गुणवत्ता का नियमन, भूमि कटाव नियंत्रण, परागण, कीट नियंत्रण सेवाएं। मिट्टी निर्माण, उपजाऊ तत्वों का पुन:चक्रीकरण, पानी का चक्रीकरण, बर्फ और ग्लेशियर द्वारा वर्ष पर्यंत जल प्रदान सेवाएं।
सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण मित्र पर्यटन, सौन्दर्य सेवाएं आदि। जैव विविधता के विनाश से उपरोक्त सभी सेवाएं प्रदान करने की हिमालय की सामथ्र्य क्षीण होती जाएगी जिससे भारतीय महाद्वीप में जीवनयापन के लिए कई समस्याएं पैदा हो जाएंगी जिनका समाधान संभव नहीं होगा। जैव विविधता के ह्रास के चलते जहां एक ओर ग्लेशियर पिघल रहे हैं और बर्फ रेखा पीछे हट रही है वहीं वनों में विविधता के घटने से जल संरक्षण में भी कमी आ रही है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव खेती पर पड़ रहा है।
सिंचाई के लिए क्षेत्रीय टकराव बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर खरपतवारों के आक्रमण के कारण बेकार हो चुकी चरागाहों के चलते पर्वतीय क्षेत्रों में चारे का संकट खड़ा हो गया है। पंजाब-हरियाणा से तूड़ी लाकर कमी पूरी की जा रही है। यह तूड़ी पहाड़ों तक पहंचते 10 से 15 रुपए किलो तक हो जाती है। इतनी महंगी घास से पशुपालन आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बनता जा रहा है। वनों में विविधता के नाश से अन्य वन्य प्राणियों के लिए भी भोजन का संकट पैदा हो गया है, इसलिए मानव-वन्यप्राणी टकराव बढ़ता जा रहा है।
विशेषकर बंदर, सूअर, नीलगाय द्वारा फसलों को नुक्सान के चलते किसान कई इलाकों में खेती छोडऩे पर मजबूर हो चुका है। बेसहारा छोड़े जा रहे पशुओं के पीछे भी चरागाहों में खरपतवार के कारण घास उत्पादन समाप्त होना एक कारण है। समय की जरूरत है कि जैव विविधता के संरक्षण के लिए गंभीरता से प्रयास किए जाएं।




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