आरई मैग्नेट में आत्मनिर्भरता की ओर भारत
- अम्बिका कुशवाहा 'अम्बी'
जिन सात दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के बिना आज का इलेक्ट्रिक मोटर, पवन टरबाइन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और स्मार्टफोन काम नहीं कर सकता, उनमें से अधिकांश का वैश्विक उत्पादन और उनसे बनने वाले सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक (NdFeB और SmCo) का 91-93 प्रतिशत आज भी चीन के पास है। यह एकतरफा निर्भरता लंबे समय से भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर खतरा रही है। पिछले कुछ महीनों में चीन ने इन सामग्रियों पर निर्यात नियंत्रण और कड़े कर दिए हैं। अब भारत सरकार ने जो जवाब दिया है, वह न सिर्फ समयोचित है, बल्कि ऐतिहासिक भी है।
7,280 करोड़ रुपये की नई PLI ( उत्पादन-लिंक्ड इंसेंटिव) योजना के तहत भारत अब रेयर अर्थ ऑक्साइड से लेकर फिनिश्ड सिन्टर्ड मैग्नेट तक पूरी वैल्यू चेन स्वदेश में स्थापित करने जा रहा है। 6,000 टन वार्षिक क्षमता का लक्ष्य है, जो 2030 तक देश की अनुमानित मांग (7,200 टन) को लगभग पूरा कर देगा। यह कोई आधी-अधूरी योजना नहीं है। स्पष्ट रूप से सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि रेयर अर्थ अलगाव, धातु बनाना, मिश्रधातु और सिन्टरिंग सब कुछ भारत में होना चाहिए।
इससे 8,000–10,000 उच्च-कुशल प्रत्यक्ष नौकरियाँ (मैटेरियल साइंटिस्ट, मेटलर्जिकल इंजीनियर, केमिकल इंजीनियर, प्रोसेस टेक्नोलॉजिस्ट) और सप्लाई चेन-लॉजिस्टिक्स में 40,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोज़गार पैदा होंगे। कुल मिलाकर सात साल में लगभग 50,000 लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।
सबसे क्रांतिकारी प्रावधान है चयन की प्रक्रिया। ग्लोबल कॉम्पिटिटिव बिडिंग में जो कंपनी सबसे कम इंसेंटिव (वित्तीय सहायता) मांगेगी, वही जीतेगी। इससे सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा और वही कंपनियाँ आएंगी जो सचमुच तकनीक और पूंजी ला सकती हैं। विदेशी कंपनियों को भी आमंत्रित किया गया है, लेकिन सिर्फ जॉइंट वेंचर (साझेदारी) के रूप में और वह भी तभी, जब वे पूरी एकीकृत फैक्ट्री लगाएं। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बिना कोई शॉर्टकट नहीं चलेगा।
यह कदम इसलिए भी परफेक्ट टाइमिंग है क्योंकि दुनिया अब चीन-प्लस-वन रणनीति अपना रही है। भारत के पास पहले से मौजूद मोनाजाइट भंडार (विश्व में पांचवें नंबर पर), केरल-ओडिशा का समुद्री खनन संभावना और अब यह आक्रामक नीति मिलकर भारत को अगले दशक में वैश्विक रेयर अर्थ मैग्नेट हब बना सकते हैं।
योजना की अवधि कुल 7 वर्ष रखी गई है। पहले 2 वर्ष प्लांट स्थापना (गर्भावस्था अवधि) एवं अगले 5 वर्ष बिक्री पर इंसेंटिव के लिए रखी गई। आलोचक कह सकते हैं कि 7 साल बहुत लंबा समय है। लेकिन जो लोग इस उद्योग को जानते हैं, वे बताते हैं कि रेयर अर्थ सेपरेशन प्लांट और हाई-टेम्परेचर सिन्टरिंग लाइन लगाना बेहद जटिल और पूंजी-गहन काम है। दो साल की गर्भावस्था अवधि वास्तव में उचित है।
अंत में एक बात स्पष्ट है कि यह योजना सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन या पवन ऊर्जा के लिए नहीं है। यह उन मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और सोनार सिस्टम के लिए है जिनकी सप्लाई चीन कभी भी रोक सकता है। यह योजना इसलिए सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता का नहीं, रणनीतिक स्वतंत्रता और बाहरी सुरक्षा का उद्देश्य है। यह समय निजी क्षेत्र भी आगे आना चाहिए। क्योंकि अगले दशक का सबसे बड़ा रणनीतिक अवसर भारत के सामने खुलने की संभावना है।





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