उचित काउंसिलिंग जरूरी
 राजीव त्यागी
मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय में एमबीबीएस क एक छात्र का शव फंदे से लटका मिला है। पहले आमतौर पर परीक्षाओं के तनाव से छात्र अवसाद में आ जाते थे और इस तरह की घटनाएं हो जाती थी। लेकिन अब यह बात बेमानी हो चुकी है। विडंबना यह है कि दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाले देश में रोजगार के अवसर जनसंख्या के अनुपात में नहीं बढ़े हैं, जिससे स्पर्धा और कठिन हो गई है। 
उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश हो या फिर नौकरी के अवसर, वे प्रतियोगियों के मुकाबले बहुत कम होते हैं, जिसकी परिणति छात्रों में बढ़ते तनाव और कालांतर में उसके अवसाद में बदलने के रूप में होती है। यही वजह है कि स्कूल-कालेजों के परीक्षा परिणाम आने पर देश में आत्महत्या करने वाले छात्रों की सुर्खियां अखबारों में बनती हैं। यह वैज्ञानिक सत्य है कि किसी भी व्यक्ति में मस्तिष्क व हृदय के बीच संचार-तंत्र टूटने से तनाव पैदा होता है।


 ऐसे में आईआईटी मद्रास ने परीक्षा के तनाव को पहचानने के जो जैविक संकेत पहचाने हैं, वे आने वाले समय में तनाव प्रबंधन में मददगार साबित हो सकते हैं। कोशिश है कि अब एआई की मदद से छात्रों के तनाव जोखिम की पहचान की जा सके। दरअसल, नये शोध की मुख्य बातें दो शारीरिक संकेतों को जोड़ने में निहित हैं। 
फ्रंटल अल्फा एसिमिट्री यानी एफएए, जो कि भावनात्मक नियमन का मस्तिष्क आधारित संकेतक है। दूसरा हार्ट रेट वैरिएबिलिटी, जो हृदय के अनुकूलन नियंत्रण को मापता है। ये संकेत चिंताग्रस्त छात्रों की पहचान करने में मदद करते हैं। शोधार्थियों ने पाया कि जिन छात्रों में एफएए पैटर्न नकारात्मक होता है, उनमें तनाव से हृदय के संतुलन तंत्र की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। 



परिणामस्वरूप वे अधिक तनाव में आ जाते हैं। शोध में इन तथ्यों को भी समझने का प्रयास हुआ कि एनसीआरटी का एक अध्ययन बताता है कि देश में 81 फीसदी छात्र परीक्षा को लेकर तनाव में रहते हैं। ऐसे में छात्रों की देखरेख और समय-समय पर उनकी काउंसलिंग की जानी चाहिए।

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