साझा सहमति जरूरी
ईलमाअज़ीम
इसमें कोई संदेह नहीं कि आज दुनिया बेहद गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इसके बावजूद, अधिकांश देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई है।
तेजी से बढ़ता हुआ कार्बन उत्सर्जन और तापमान में वृद्धि मानव अस्तित्व के लिए गंभीर खतरे की घंटी बनते जा रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण विकसित देशों का अपनी कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रति संजीदगी से काम न करना है। जबकि इन देशों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए निर्धारित समय सीमा से पहले ‘नेट जीरो’ लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए था, क्योंकि इन देशों का कार्बन उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान है।
यह जानते हुए कि अब हमारे पास समय बहुत कम बचा है और पेरिस समझौते को प्रभावी रूप से लागू करना अत्यंत आवश्यक है, मुख्य रूप से तीन सवालों पर विचार करना जरूरी है। पहले, दुनियाभर के देशों द्वारा जलवायु कार्रवाई को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है। दूसरे, तकनीक, राहत राशि और वित्तीय सहायता उन देशों तक कै
से पहुंचाई जा सकती है, जो इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं और जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। तीसरे, जलवायु कार्रवाई को समग्र और समावेशी तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है।
से पहुंचाई जा सकती है, जो इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं और जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। तीसरे, जलवायु कार्रवाई को समग्र और समावेशी तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है।
इन तीन प्रश्नों के मध्य ही समग्र जलवायु समाधान की दिशा तलाशनी होगी। दुनियाभर के 194 देशों की जलवायु मुद्दे पर एकमत से सहमति यह जाहिर करती है कि अब जलवायु मुद्दा वैश्विक नेतृत्व का सवाल नहीं रह गया है और न ही यह नैतिक मुद्दा है, बल्कि अब यह आर्थिक सुरक्षा और विकास का भी सवाल बन चुका है। मौजूदा देशों ने यह स्वीकार किया कि विकासशील देशों के हितों को प्राथमिकता देना अब समय की आवश्यकता है।
खासकर, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित गरीब देशों के लिए फंड के आवंटन को लेकर सम्मेलन में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इन देशों को मौसम के कहर से निपटने के लिए तीन गुना अधिक वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसके अलावा, विकसित देशों से यह अपील की गई कि वे 2035 तक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए गरीब देशों को दी जाने वाली राशि को कम से कम तीन गुना बढ़ा दें।
काप सम्मेलन में हालांकि, अधिकतर देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एकजुट होने की कोशिश की, लेकिन अमीर और विकासशील देशों, साथ ही तेल, गैस और कोयला उद्योग से जुड़े देशों के बीच मतभेद बने रहे। ये मतभेद उनके पुराने दृष्टिकोण को दर्शाते हैं, और यह साफ दिखता है कि इन मुद्दों पर वे अभी भी अपनी स्थिति से पूरी तरह अडिग हैं। इसके अलावा, जंगलों की सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर आम सहमति न बन पाने के कारण यह भी अनसुलझा ही रह गया।




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