चरित्र निर्माण भाषण से नहीं, आचरण से होता है  

 मेरठ।  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, मेरठ केंद्र एवं चौधरी चरण सिंह विवि के संयुक्त तत्वावधान में छात्रों के चरित्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका ” विषय पर एक व्यापक, चिंतनशील एवं प्रेरणादायी संवाद कार्यक्रम का आयोजन भौतिकी विज्ञान विभाग, में किया गया।

 कार्यक्रम में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा विद्यालय स्तर के शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुरूप माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के विश्वविद्यालय संयोजक प्रो. अनिल मलिक ने उपस्थित शिक्षकों का स्वागत करते हुए मुख्य वक्ता श्री जगराम  भाई साहब (उत्तर एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास) का परिचय कराया। 

उन्होंने न्यास के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का संकल्प केवल शैक्षणिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को संस्कारयुक्त, संवेदनशील, जिम्मेदार एवं सम्पूर्ण मनुष्य बनाना है।  कार्यक्रम की प्रस्तावना डॉ. अशोक द्वारा प्रस्तुत की गई। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में ज्ञान की उपलब्धता बढ़ी है, परंतु संस्कारों की आवश्यकता और भी अधिक महसूस की जा रही है। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। 

मुख्य वक्ता जगराम ने अपने विस्तृत, आत्ममंथन को प्रेरित करने वाले संबोधन में कहा कि चरित्र निर्माण कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे कक्षा में अलग से पढ़ाया जाए, बल्कि यह शिक्षक और अभिभावक के दैनिक जीवन के आचरण से स्वतः छात्रों के भीतर विकसित होता है । उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज का शिल्पकार होता है और उसके व्यवहार, बोलचाल, समयपालन तथा नैतिक दृष्टिकोण का सीधा प्रभाव छात्रों पर पड़ता है।  उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे स्वयं को केवल विषय विशेषज्ञ न मानें, बल्कि पहले माता-पिता के रूप में अपनी भूमिका को समझें। उन्होंने कहा—“ जो गुण हम अपने बच्चों और छात्रों में देखना चाहते हैं, उनकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी। चरित्र निर्माण कहा नहीं जाता, वह होकर दिखाया जाता है। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि यदि हम बच्चों को सुबह जल्दी उठने, अनुशासन में रहने, समय का सम्मान करने, सत्य बोलने और ईमानदारी से जीवन जीने की सीख देते हैं, तो सबसे पहले हमें अपने जीवन में इन आदतों को अपनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार बच्चे की पहली पाठशाला है और घर का वातावरण उसके चरित्र की नींव रखता है। बच्चों के सामने पति-पत्नी का व्यवहार मधुर, सम्मानपूर्ण और संतुलित होना चाहिए, क्योंकि वही संस्कार बच्चों के मन में स्थायी रूप से अंकित होते हैं।कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि शिक्षक अपने आचरण, व्यवहार और जीवनशैली के माध्यम से छात्रों के चरित्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगे तथा संस्कार, संस्कृति और शिक्षा के समन्वय से एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण में योगदान देंगे।       

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