लोकतांत्रिक चुनावों में "जातिसूचक" शब्द पर बैन जरूरी


- प्रो. नंदलाल
भारतवर्ष में चुनाव बहुत खतरनाक रूप ले चुका है। हालांकि भारतीय लोकतंत्र की तारीफ विश्व स्तर पर होती है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चली हैं पर समय के साथ साथ इसका परीक्षण भी जरूरी है। स्वतंत्रता के बाद जो लोकतंत्र देश में स्थापित हुआ वह एक धुरीय राजनीति के सहारे आगे बढ़ता रहा और न सिर्फ एक धुरीय था अपितु उन नेताओं के साथ-साथ आगे बढ़ता रहा जिनमें राजनीतिक समझदारी और मूल्य कूट कूट के भरे थे। वे मूल्य स्व स्फूर्त थे। स्वतंत्रता पूर्व कुछ नेताओं की नियति और सामाजिक ताने बाने का अहम विद्वेष के रूप में प्रकट हुआ और जाति तथा संप्रदायगत राजनीति का श्रीगणेश हो गया। संसद में आरक्षण और देश का बंटवारा इसका साक्षात उदाहरण है। भारतीय लोकतंत्र में उसी का पदार्पण घुन के रूप में हुआ और आज तो भारतीय लोकतंत्र की चादर कई जगह से छिद्रों से भरा हुआ है।



       संविधान निर्माताओं ने बहुत मेहनत और मशक्कत के बाद जिस संविधान को सामने रखा उसमें कुछ ऐसी व्यवस्था जाने अनजाने की गई जिसने बाद के दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।उन्नीस सौ नब्बे के दशक में जिस सामाजिक न्याय का नारा संविधान से निकाला गया उसने देश को झकझोरने का कार्य किया और एक नई बहस और व्यवस्था लोगो के सामने रख दिया गया। यह तो भारतीय संस्कृति, राजनैतिक मूल्य और भारतीय लोकतंत्र का कमाल ही था जिसने देश को बांग्ला देश और नेपाल नहीं बनने दिया वरना यहां भी तख्ता पलट के नारे लगते। नारे तो उस समय लगे किंतु भारतीय लोकतंत्र ने उसे सम्हाल लिया और देश का मूड मंदिर के तरफ घुमा दिया गया। बीसवीं सदी का अंतिम दशक भारतीय राजनीति और लोकतंत्र का निर्णायक दशक था जो सदियों याद किया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी का उदय आडवाणी जी की रथ यात्रा और बाजपेई जी की सरकार लोकतंत्र को बचाने की एक अंकथ कहानी थी।मंडल और कमंडल का दर्शन यदि समझें तो कमंडल ने समूचे हिंदुओं को एक बड़े छतरी के नीचे ला खड़ा किया और मंडल का संघर्ष उस बड़े छतरी के एक हिस्से का था, जो अब भी चल रहा है किंतु हिन्दू राजनीति ने दो हजार चौदह में सत्ता कमंडल पक्ष में कर दिया जो अनवरत चल रहा है। इस बीच में समाज में इतने अंतर्विरोध उपजे जिससे सामाजिक ताना बना असंतुलित हो गया और समाज में जातीय उन्माद पैदा हो गया।जातिगत और वर्ग गत चेतना ने इसकी खाई और गहरी कर दी।स्थिति यहां तक निर्मित हो गई है कि पिछड़े वर्गों में कई उपवर्ग उभर आए और सभी ने अपने नेता के रूप में किसी न किसी को स्थापित कर लिया और वे नेता अपनी जातियों के ठेकेदार हो गए। उसी तरह दलित वर्ग में अलग अलग नेता बन गए।ये इतना टूट गए कि इनकी दरार बढ़ती चली गई। इन्हें सम्हाल के रख पाना एक अलग किस्म की चुनौती है।



      पिछड़े और दलित वर्ग के नेताओं का अस्तित्व सामान्य वर्ग के विरोध पर टिका है। और अपने बीच में अपने को स्थापित करने के लिए अपने नेताओं को पीछे भी छोड़ना है। इसलिए कुल मिलाकर जातीय जहर को उग्र नहीं किया जाएगा तो इनकी राजनीति का क्या होगा। ऐसे में जातियां बहस के केंद्र में आ गई हैं और अपेक्षा करती हैं कि इनसे सामान्य वर्ग के लोग अच्छा व्यवहार करें। कैसे संभव है कि आप अपनी राजनीति चमकाने के लिए सवर्णों को निशाना बनाए और वे आपसे सामान्य व्यवहार करें। इसलिए समाज में हलचल है। चुनाव में अभद्रता है।शिक्षित, पढ़ेलिखे लोग, योग्य उम्मीदवार कहीं पीछे छूट जाते हैं और बेइमानी से उगाहे हुए धन से चुनाव लड़कर अपने समाज के लोगों को दारू पिलाकर वोट लेते हैं।
भारतीय समाज में पिछड़े के नाम पर जो एक दो सम्पन्न जातियां हैं वहीं हर जगह आगे हैं और अन्य पिछड़ों को पिछड़े के नाम पर मलाई काट रहे हैं। गाहे बगाहे प्रधानमंत्री जी तक को कहना पड़ता है कि वह भी पिछड़े समाज के निचले पायदान से आते हैं। भारतीय लोकतंत्र जाति की गंदगी में मैला हो रहा है इसे बचाना होगा अन्यथा देश को इसका खामियाजा  लंबे समय तक भुगतना होगा।



          क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यह सर्वविदित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार, विकास के नाम पर राजनीति होनी चाहिए न कि जाति के नाम पर। जाति के नाम पर राजनीति ,एक दूसरे को नीचा दिखाकर की जाने वाली राजनीति, समाज को और विभाजित करेगी और हम बंटते चले जाएंगे। अभी एक दिन पहले एक अभिनेता से नेता बने  सांसद बिहार में प्रचार के दौरान महाभारत का उद्धरण देते हुए कह रहे थे कि युद्ध में जब अर्जुन ने अपने सगे संबंधियों को देखा तो उनके हाथ से गांडीव गिर पड़ा तब अर्जुन को कृष्ण ने समझाया कि सामने जो खड़े हैं वे सब अधर्मी हैं इसलिए अधर्म के नाश के लिए तुम्हें गांडीव उठाना ही पड़ेगा। अब यह बात समझ में नहीं आती कि बिहार के चुनाव में कौन अर्जुन है और कौन कृष्ण हैं पर नेता जी तो अपने को अर्जुन मान ही बैठे हैं। इस चुनाव में सभी दुर्योधन, दुशासन और कर्ण ही दिख रहे हैं। हर तरफ शकुनि के हाथ में पासे ही दिख रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक हो चला है कि भारतीय लोकतंत्र को द्यूतक्रीड़ा न बनने दिया जाय और जातिसूचक शब्दों के प्रयोग पर बैन लगाया जाय और यह तभी संभव हो सकेगा जब हम मजहबी राजनीति से बाहर आयेंगे।
(महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय, विश्वविद्यालय,चित्रकूट, सतना)

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