द. एशिया में भारत की संप्रभुता और कूटनीति पर नई चुनौती
- ममता कुशवाहा
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की यात्रा के दौरान उनकी एक टिप्पणी ने भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील रिश्तों में नया तनाव उत्पन्न कर दिया है। गुटेरेस ने ढाका में अपने दौरे के दौरान दिए एक बयान में अप्रत्यक्ष रूप से उन क्षेत्रों का उल्लेख किया, जिन्हें उन्होंने “पूर्वोत्तर भारत के हिस्से” के रूप में नहीं, बल्कि “बांग्लादेश का अभिन्न अंग” बताया। इस टिप्पणी को लेकर भारत में तीखी प्रतिक्रिया देखी गई, क्योंकि यह न केवल भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की ऐतिहासिक वास्तविकताओं की भी अनदेखी करती है।
वास्तव में इस घटना की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका और संयुक्त राष्ट्र के कुछ पदाधिकारियों की संदिग्ध गतिविधियाँ भी सामने आई हैं। संयुक्त राष्ट्र की ‘चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी’ की एक बैठक में पाकिस्तानी प्रतिनिधि जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की ओर से एक मानचित्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम और मेघालय के कुछ हिस्सों को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया। यह मानचित्र यूएन की बैठक में पहली बार नहीं देखा गया, लेकिन इस बार इसकी प्रस्तुति का राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व अधिक था क्योंकि बैठक में गुटेरेस के नजदीकी अधिकारी भी मौजूद थे। भारत ने इस पर कड़ा आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह न केवल भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग भी है।
1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हुआ, तब भारत ने न केवल निर्णायक सैन्य भूमिका निभाई थी बल्कि पाकिस्तान की पूर्वी सीमा पर लाखों शरणार्थियों की मदद भी की थी। भारत की इस मानवीय और रणनीतिक सहायता ने बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया था। लेकिन आज यही संयुक्त राष्ट्र, जिसने उस समय पाकिस्तान के अत्याचारों की निंदा करने में हिचक दिखाई थी, अब उन्हीं विचारों को बढ़ावा दे रहा है जिनसे भारत की भौगोलिक सीमाओं पर प्रश्न उठते हैं।
यूएन प्रमुख गुटेरेस के हालिया बयानों में भी पाकिस्तान की नीति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने ढाका में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि “दक्षिण एशिया में सीमाओं की पुनर्समीक्षा का प्रश्न अब भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए खुला है।” यह कथन बेहद असंवेदनशील और विवादास्पद था क्योंकि दक्षिण एशिया में सीमाओं का मुद्दा ऐतिहासिक और संवैधानिक रूप से निपट चुका है। भारत ने 1974 में बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता किया था, जिसे दोनों देशों की संसदों ने अनुमोदित किया। इसके बाद 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐतिहासिक भूमि सीमा समझौते के तहत दोनों देशों के बीच की सीमाओं का अंतिम निर्धारण कर दिया गया।
परंतु संयुक्त राष्ट्र के हालिया रुख से ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी न किसी रूप में क्षेत्र में पुनः अस्थिरता उत्पन्न करने की कोशिश कर रहा है। इसके पीछे तुर्की और इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) जैसे समूहों की लॉबिंग भी बताई जा रही है, जो लंबे समय से भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुष्प्रचार करते आए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में यह स्पष्ट किया कि गुटेरेस के बयानों के पीछे "तुर्की आधारित गैर-सरकारी संगठनों" की भूमिका संदिग्ध है, जो ‘सुल्तनत-ए-बाल्कान’ नामक इस्लामी समूह के माध्यम से दक्षिण एशिया में अलगाववादी विचारों को बढ़ावा देते हैं।
भारत के लिए यह केवल एक राजनैतिक चुनौती नहीं, बल्कि उसकी क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। भारत की पूर्वोत्तर सीमाएँ पहले ही संवेदनशील हैं, जहाँ चीन और म्यांमार के साथ भू-राजनीतिक तनाव जारी है। यदि संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन इस प्रकार की विवादास्पद टिप्पणियाँ करते हैं, तो इससे न केवल भारत की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ेंगी बल्कि बांग्लादेश के साथ उसके घनिष्ठ संबंधों पर भी असर पड़ेगा। भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले एक दशक में व्यापार, नदी जल बंटवारा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और सीमावर्ती विकास परियोजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दोनों देशों ने मिलकर यह साबित किया है कि परस्पर सहयोग के आधार पर क्षेत्रीय स्थिरता हासिल की जा सकती है।
ऐसे में यूएन प्रमुख के वक्तव्य को केवल “कूटनीतिक भूल” नहीं कहा जा सकता। इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक सोच दिखाई देती है, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को कमज़ोर करना है। पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने के प्रयास करता रहा है, लेकिन उसे ठोस सफलता नहीं मिल पाई। अब वही प्रयास ‘संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता’ के आवरण में किए जा रहे हैं। गुटेरेस का यह बयान न केवल भारत के लिए अपमानजनक है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह भी याद रखना आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र ने अतीत में भी कई बार ऐसे निर्णय लिए हैं जो भारत के दृष्टिकोण के विपरीत रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर यूएन के पुराने प्रस्ताव आज भी पाकिस्तान के दुष्प्रचार का आधार बने हुए हैं, जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और यह विषय अब द्विपक्षीय समझौतों के तहत ही सुलझाया जा सकता है।
यूएन प्रमुख का यह रुख भारत के लिए कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। पहला, यह दक्षिण एशिया में भारत की कूटनीतिक साख को कमजोर करने की कोशिश है। दूसरा, यह बांग्लादेश के साथ भारत के विश्वास आधारित संबंधों में अविश्वास का बीज बो सकता है। तीसरा, यह पाकिस्तान को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर “पीड़ित देश” के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर दे सकता है, जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान स्वयं आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला राष्ट्र है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में बैंकॉक में हुए ‘विस्तृत शिखर सम्मेलन’ के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चेताया था कि कुछ शक्तियाँ दक्षिण एशिया को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं और इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है। मोदी ने उस अवसर पर विशेष रूप से कहा था कि “ढाका से दिल्ली तक स्थिरता और सहयोग की भावना ही एशिया की नई शक्ति बन सकती है।” यह कथन भारत की स्पष्ट नीति को रेखांकित करता है कि वह क्षेत्रीय शांति के लिए प्रतिबद्ध है, न कि विवादों के लिए।
संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसकी विश्वसनीयता का आधार निष्पक्षता है। यदि उसके प्रमुख ही किसी एक देश या विचारधारा के प्रभाव में आकर बयान देंगे, तो इससे संस्था की नैतिक प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुँचेगी। भारत ने इस घटना पर संयमित प्रतिक्रिया दी है, परंतु यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि “भारत किसी भी ऐसे बयान को स्वीकार नहीं करेगा जो उसकी सीमाओं या संप्रभुता पर प्रश्न उठाए।”
यूएन प्रमुख का यह विवादास्पद बयान केवल एक भाषण या मानचित्र की गलती नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का परिचायक है जो एशिया में शक्ति-संतुलन को बदलना चाहती है। भारत के लिए यह समय है कि वह न केवल कूटनीतिक स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय जनमत के स्तर पर भी सक्रिय हो। भारत को यह दिखाना होगा कि दक्षिण एशिया में स्थिरता, विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा संरक्षक वही है।
आज जब विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की भूमिका और जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक है। यदि ये संस्थाएँ अपने मूल उद्देश्य- शांति, न्याय और समानता से भटक जाएँगी, तो वैश्विक राजनीति में उनका महत्व स्वतः कम हो जाएगा। भारत जैसे जिम्मेदार और लोकतांत्रिक राष्ट्रों को इस चुनौती का सामना दृढ़ता, संयम और विवेक के साथ करना होगा, ताकि दक्षिण एशिया एक बार फिर संघर्ष का मैदान नहीं, बल्कि सहयोग और विकास का केंद्र बन सके।





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