वृद्धों की स्थिति चिंताजनक
इलमा अज़ीम
देश में वृद्धों की स्थिति काफी चिंताजनक है। जबकि वृद्धजन भारतीय समाज की धरोहर माने जाते रहे हैं, उन्हें अनुभव और ज्ञान का भंडार मानते हैं। इसके बावजूद यदि हम उन्हें उपेक्षित करेंगे तो यह केवल अन्याय ही नहीं, बल्कि सभ्यता एवं संस्कृति की पराजय है। वृद्धजन केवल जीवित बोझ नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और मूल्यों के संरक्षक हैं। उनका सम्मान करना न केवल हमारा नैतिक कर्तव्य है बल्कि एक बेहतर, संवेदनशील और संतुलित समाज के निर्माण की अनिवार्यता है।
भारत में परंपरागत भारतीय परिवार व्यवस्था में वृद्धजनों को सम्मान, सुरक्षा और निर्णय लेने की अहम भूमिका प्राप्त थी। लेकिन आज शहरीकरण, परमाणु परिवार, प्रवास और उपभोक्तावादी सोच ने उनकी भूमिका को हाशिए पर पहुँचा दिया है। परिवार के भीतर उन्हें आर्थिक बोझ समझा जाने लगा है, पीढ़ीगत टकराव और मूल्यों में बदलाव ने दूरी बढ़ा दी है, नौकरी-पेशा बच्चों के व्यस्त जीवन में धैर्य और देखभाल की कमी स्पष्ट हो रही है और संपत्ति तथा अधिकारों को लेकर तनाव आम हो गया है।
इसके परिणामस्वरूप वृद्धजन शारीरिक बीमारियों से जूझते हैं, पर पर्याप्त चिकित्सा नहीं मिलती। वे अकेलेपन और मानसिक अवसाद का शिकार होते हैं, उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है और कभी-कभी घरेलू हिंसा और संपत्ति विवादों में भी उलझना पड़ता है। चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि वृद्धों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को रोके।
क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्धों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है। वृद्धावस्था जीवन की सांझ है। वस्तुतः वर्तमान के भागदौड़, आपाधापी, अर्थ प्रधानता व नवीन चिन्तन तथा मान्यताओं के युग में जिन अनेक विकृतियों, विसंगतियों व प्रतिकूलताओं ने जन्म लिया है, उन्हीं में से एक है वृद्धों की उपेक्षा। इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए परिवार, समाज और सरकार-सभी स्तरों पर समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।






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