फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी में भारत अपनी पूरी शान से चमकता है: डॉ. तक़ी आबिदी
फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी खूबसूरती और इंसानियत के ऊंचे मूल्यों से सजी है : डॉ. परवेज़ शहरयार
चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ के उर्दू डिपार्टमेंट ने फ़िराक़ गोरखपुरी पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, “हमारी आवाज़” (विभागीय पत्रिका का नया अंक) और प्रोफ़ेसर असलम जमशेदपुरी के हिंदी नॉवेल “धनौरा” का विमोचन
मेरठ। फ़िराक़ बीसवीं सदी के एक महान ग़ज़ल शायर हैं। फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी में भारत अपनी पूरी शान से चमकता है। फ़िराक़ की ग़ज़ल में जो दर्द है, वह उनके उस्ताद का मज़हब है। लेकिन यह भी एक सच है कि फ़िराक़ के साथ इंसाफ़ नहीं हुआ, उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे। जो कौम अपने हीरो को नई पीढ़ी तक नहीं पहुंचा सकती, वह तरक्की भी नहीं कर सकती। फ़िराक़ की एक खूबी यह है कि वे बड़ी बातें नरम लहजे में कह देते हैं। उनकी शायरी में बहुत गहराई है। ये शब्द अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तकी आबिदी [कनाडा] के थे, जो उर्दू विभाग में आयोजित एक दिवसीय फिराक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार “फिराक गोरखपुरी : शेर ओ अदब” में अपना मुख्य वक्तव्य दे रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि फिराक ने उर्दू शायरी को एक नया प्रेमी और एक नया महबूब दिया है। इससे पहले मौलाना मुहम्मद जिब्रील ने पवित्र कुरान की तिलावत से कार्यक्रम की शुरुआत की। नात उज़्मा मेहंदी ने पेश की। बाद में फरहत अख्तर ने फिराक गोरखपुरी की ग़ज़ल पढ़कर सत्र का आगाज़ किया। उद्घाटनसत्र की अध्यक्षता प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। मुख्य वक्ता कनाडा से आए प्रसिद्ध शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तकी आबिदी रहे । स्वागत भाषण डॉ. आसिफ अली ने दिया, डॉ इरशाद स्यानवी ने फिराक गोरखपुरी का परिचय और संचालन डॉ. शादाब अलीम ने किया। इस सत्र में डॉ. अलका वशिष्ठ ने “फिराक़ गोरखपुरी के साहित्य में सौंदर्य चेतना, शहनाज़ परवीन ने “फिराक़ गोरखपुरी की रुबाइयों में सौंदर्यशास्त्र : एक अध्ययन” और सरताज जहाँ ने “फिराक़ गोरखपुरी : परंपरा से आधुनिकता तक एक आलोचनात्मक समीक्षा” शीर्षक से पेपर पेश किए। दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. तकी आबिदी ने की, मुख्य अतिथि श्री आशाराम जी (दिल्ली) रहे।
विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री आफाक अहमद खान, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो.प्रज्ञा पाठक (एन.ए.एस. कॉलेज,मेरठ)तथा वक्ता के रूप में डॉ विद्या सागर (हिंदी विभाग, सीसीएसयू)उपस्थित रहे। संचालन डॉ. अलका वशिष्ठ ने किया। इस दौरान विभाग की पत्रिका “हमारी आवाज़” और प्रोफेसर असलम जमशेद पुरी के हिंदी उपन्यास “धनौरा” का विमोचन किया गया। पत्रिका पर डॉ. आसिफ अली और उपन्यास धनौरा पर प्रोफेसर प्रज्ञा पाठक और डॉ. विद्या सागर, अफाक अहमद खान, वीर पाल सिंह और श्री आशाराम जी ने अपने विचार व्यक्त किए। जिसका निचोड़ यह था कि इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए लेकिन वह अपनी जन्मभूमि को नहीं भूलता। धनौरा कोई मनगढ़ंत नॉवेल नहीं है, बल्कि इसमें जीती-जागती तस्वीरें हैं। देश के हालात को बिना किसी कड़वाहट के बहुत शांति से दिखाया गया है। धनौरा पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि असलम जमशेदपुरी किस तरह के नॉवेलिस्ट हैं। धनुरा पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि भारत में हिंदू और मुसलमानों की कोई समस्या नहीं है। भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी और अज्ञानता है, हमें इस बारे में सोचना चाहिए। हम अहिंसा के साथ हैं। जब हम हिंदी के आंगन में कदम रखते हैं तो हमें इंग्लिश के आंगन को भी अपनाना चाहिए क्योंकि वह लिखावट बेमतलब है जिससे आपको कोई मैसेज न मिले। अगर डॉ. साहब की सोच और काबिलियत के बारे में कोई कसीदा पढ़ा जाए तो वह भी कम है। "धनौरा" पढ़ने के बाद आपको लगता है कि हिंदू और मुसलमान एक हैं। आपको एक बार धनौरा आकर इसे अपनी आंखों से जरूर देखना चाहिए।
संगोष्ठी के तीसरे और चौथे सत्र के अध्यक्षीय मंडल में डॉ. आसिफ अली, डॉ. रेहाना सुल्ताना, डॉ. फरहत खातून सैयद हैदर अली, जीशान खान, महमूद बदर, इंजीनियर रिफत जमाली आदि रहे। इस सत्र में इलमा नसीब ने 'गोरखपुर मंडल के सौंदर्य का सिद्धांत और उर्दू गजल की नई रचनात्मकता', मुहम्मद हारून ने 'गोरखपुर मंडल की गजल', आसिया मैमूना ने 'गोरखपुर मंडल की शायरी', इरफान आरिफ ने 'गोरखपुर मंडल का काव्य सौंदर्यशास्त्र', उज़मा मेहदी ने 'गोरखपुर मंडल का आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य' पर अपने पेपर पढ़े गए । कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. परवेज़ शहरयार ने कहा कि फिराक गोरखपुरी एक शानदार और तेजस्वी व्यक्तित्व थे। उनकी महान शायरी को दुनिया जानती है। उर्दू शायरी में हिंदुस्तानी संस्कृति को जिस तरह से वे पेश करते हैं, वह उनका परफेक्शन है, उनकी शायरी खूबसूरती और इंसानियत के ऊंचे मूल्यों से सजी है। इस टॉपिक पर इंटरनेशनल सेमिनार ऑर्गनाइज़ करके, उर्दू डिपार्टमेंट के प्रेसिडेंट प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने उर्दू शायरी के ऊंचे मूल्यों और शानदार परंपरा को बहुत अच्छे से रोशन किया है।
प्रोफेसर तनवीर चिश्ती ने कहा कि फिराक गोरखपुरी ऐसे महान सपूत का नाम है जिन्होंने इस गंगा-जमनी तहज़ीब को एक ऐसी ज़बान दी जो यहां रहने वाले लोगों की रूह की ताबीर और कौमी एकता की वाहक है।आशा राम ने कहा कि धनौरा में गांवों की सीधी-सादी ज़िंदगी को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है और इसके किरदार मनगढ़ंत नहीं बल्कि असली हैं। मैं खुद इसमें एक जीता-जागता किरदार हूं।
प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि इस नॉवेल के तीन एडिशन उर्दू में पब्लिश हो चुके हैं, और चौथा भी जल्द ही आने वाला है। इस नॉवेल के किरदार बिल्कुल सच्चे हैं। मुझे बहुत खुशी है कि मैं अपने गांव के लिए कुछ कर पाया। यह गांव सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक तहज़ीब है। इस गांव के किरदार सिर्फ़ इस नॉवेल में ही नहीं हैं, बल्कि मैंने अलग-अलग कहानियों से कई किरदार लिए हैं। धनौरा ने न सिर्फ़ मुझे पाला-पोसा बल्कि, इसने मुझे बनाया है।
डॉ. ज़हीर अहमद, जमील सैफी, वीर पाल कपासिया, डॉ. नसरीन, जीशान खान, मुहम्मद शौक़ीन अली, अफ़सर अली, मदीहा असलम, मुहम्मद यामीन खान, राशिद खान, साइमा, कंवर पाल, बीरपाल, सरदार सिंह, भारत भूषण शर्मा, बीबी शर्मा, नुज़हत अख्तर, डॉ. फराह नाज़, ईसा राणा सहित बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स और शहर के गणमान्य व्यक्तियों ने हिस्सा लिया।


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