बने कार्ययोजना
 इलमा अज़ीम 
 उत्तराखंड और हिमाचल समेत कई अन्य जगहों पर हर साल मानसून के कारण हो रही अराजकता को देखते हुए स्पष्ट है कि हमारे शहर आगे के शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन की दोहरी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। शहरों के पास इन प्रभावों को प्रबंधित करने की सीमित क्षमता है। उनका नियोजन और प्रबंधन प्रणाली तेजी से हो रहे शहरीकरण, जलवायु प्रभावों और विकास तथा सेवाओं की मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है। 

मौजूदा प्रणाली पुरानी हो चुकी है- कई मामलों में, ये ब्रिटिश राज काल से विरासत में मिली हैं। उदाहरण के लिए, हैदराबाद की नालियां और वर्षा जल निकासी प्रणाली सदी पहले सर एम विश्वेश्वरैया द्वारा लगभग पांच लाख की आबादी के लिए डिज़ाइन की गई थी। उस समय यह प्रणाली आधुनिक मानी जाती थी और भविष्य के विकास तथा सौंदर्यशास्त्र व शहरी नियोजन जैसी चिंताओं को ध्यान में रखती थी।


 हैदराबाद को झीलों और बागों का शहर माना जाता था, जहां प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली अच्छी तरह से जुड़ी हुई थी। यह सब तेजी से बढ़ते भौतिक संरचना और जनसंख्या की उच्च घनत्व के कारण नष्ट हो गया। परिणामस्वरूप बाढ़ आती है। यह कहानी लगभग हर बड़े भारतीय शहर की है। कई शहर तटीय क्षेत्रों या बड़े और छोटे नदियों के बाढ़ से बने मैदानों के किनारे स्थित हैं। शहरीकरण से सतह जल अवशोषण कम हो जाता है, जिससे पहले कम जोखिम वाले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। शहर लगातार बाढ़ मैदानों पर कब्जा कर रहे हैं।
 विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1985 से 2015 के बीच, बाढ़-रहित क्षेत्रों में बसाव क्षेत्र 82 प्रतिशत और उच्च बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों में 102 प्रतिशत बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण के संयुक्त प्रभाव से वर्षा जल संबंधी या सतही जल बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ने की संभावना है। नि:संदेह, इस समस्या का समाधान शहरों को जलवायु-लचीला बनाकर तैयार करना है। इसके लिए हमें शहर-विशिष्ट जलवायु कार्ययोजनाएं बनानी होंगी। वर्तमान में ये प्रयास न के बराबर हैं। सभी राज्यों के पास सामान्य कार्य योजनाएं हैं, जिनका अधिकांशतः क्रियान्वयन कमजोर है या वे केवल कागजों तक सीमित हैं। शहरी क्षेत्रों की चुनौतियां विविध हैं, जिनके लिए समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है। स्थानीय जोखिम इतिहास के आधार पर शहरी बाढ़ से निपटने के लिए विशिष्ट रणनीतियां बनानी होंगी। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भी इसी तरह की कार्ययोजनाएं आवश्यक हैं। 


शहरों को जलग्रहण क्षेत्र आधारित बाढ़ सुरक्षा योजनाएं बनानी चाहिए ताकि बाढ़, मैदानों के विकास और वर्षा जल प्रबंधन को नियंत्रित किया जा सके। शहरों के लिए जलवायु कार्य योजना बिना संबंधित शासन सुधारों के सफल नहीं हो सकतीं। वर्तमान में बाढ़ सुरक्षा, शहरी नियोजन, नालियों आदि से संबंधित कई एजेंसियां हैं, जो अक्सर विरोधाभासी कार्य करती हैं। इसके अतिरिक्त, सरकारी एजेंसियों को जलवायु कार्य योजना को बनाने और लागू करने के लिए वैज्ञानिकों, नागरिक समाज और व्यवसायों के साथ काम करना होगा। शहरी बाढ़ या पहाड़ों में निरंतर आपदाओं का कोई आसान समाधान नहीं है।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts