ऐसी नमाज़ फिर न हुई करबला के बाद
जंग ए करबला की शहादत पर ख़्वातीनों की आंखें भी हुईं नम
मेरठ। 'सजदे में सर, गले में खंजर और तीन दिन की प्यास, ऐसी नमाज़ फिर न हुई करबला के बाद'। जंग ए करबला में 72 जांबाज शहीद हो गए लेकिन इनकी शहादत कयामत तक हुसैनी सोग़वारों को रुलाती रहेगी। मोहर्रम के सोग का सिलसिला मंगलवार को भी जारी रहा। बज़्म ए ख़्वातीन एजुकेशनल चैरिटेबल सोसायटी के बैनर तले 'यौम ए हुसैन व हज़रत जैनब की अज़मत' उन्वान (शीर्षक) से मंगलवार को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इसमें बज़्म ए ख़्वातीन से जुड़ीं सभी महिलाओं ने करबला की सभी 72 शहादतों पर अश्क बहाए। सभी वक्ताओं ने हज़रत इमाम हुसैन के सब्र पर नाज़ किया। क़मरुन्निसा ज़ैदी ने कहा कि 'घराना ए पंजतनी' ने दीन ए इस्लाम को ता-कयामत ज़िंदा रखने के लिए अपनी जानों की परवाह नहीं की। दुर्दाना अख्तर ने जब हज़रत अली अकबर के कलेजे में लगी बरछी से लेकर 72 शहीदों की लाशें उठाने और आखिरी वक्त में तीरों की बरसात के बीच नमाज़ की अदायगी का जिक्र किया तो वहां मौजूद घराना ए पंजतनी की चाहने वाली हर ख़्वातीन की आंखें नम थीं और इन आंखों से ज़ारो कतार आंसू बह रहे थे। इस दौरान हज़रत जैनब द्वारा यजीद के दरबार में दिए गए 'इंकलाबी खुतबे' से लेकर जंग के बाद उजाड़े गए खेमों के मंज़र की दास्तां सुन बज़्म में बेचैनी छा गई। इस दौरान तबस्सुम, नगमा, उस्मानी शाहीन, मुबीन, रोशन जैदी, नुजहत, हसीन, आसमां, फरहा जैदी, सोनिया, मुशर्रफ, खालदा, गुलनाज निजामी और जहीर अख्तर मुख्य रूप से मौजूद रहीं।
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