कश्मीर में लोकतंत्र की बयार
इजमा अजीम
हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी हमलों की श्रृंखला ने शांतिपूर्ण मतदान को लेकर संशय पैदा कर दिया था। लेकिन चुनाव आयोग, राज्य प्रशासन व नेताओं द्वारा जनता को जागरूक करने का सकारात्मक प्रतिसाद मिला है। निष्कर्षत: कहा जा सकता है कुछ शिकवे-शिकायतों के बावजूद कश्मीर का जनमानस शांति व लोकतंत्र में विश्वास रखता है। बहुत सालों बाद कश्मीर में मतदाताओं की लंबी-लंबी कतारें दिखाई दी। ऐसा ही उत्साह हालिया लोकसभा चुनाव में दिखा था जब पिछले साढ़े तीन दशकों के मतदान का रिकॉर्ड टूटा था। इस बार का साठ फीसदी मतदान इसी कड़ी का विस्तार कहा जा सकता है। निश्चित रूप से इन चुनावों को ऐतिहासिक कहा जा सकता है। साथ ही यह उन विदेशी ताकतों को करार जवाब है जो कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण अपने निहित स्वार्थों के लिये करते रहे हैं। बहरहाल, साबित हुआ कि देश के अन्य भागों की तरह ही कश्मीर के लोग भी शांति व सुशासन चाहते हैं। वे भी महंगाई व बेरोजगारी से निजात चाहते हैं। इस चुनाव में उन्होंने अलगाववादियों को दरकिनार करके मतदान में उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुछ मुद्दों पर असंतोष के बावजूद लोगों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी की है। विचारों में यह असहमति लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि घाटी के लोगों की आकांक्षाओं की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र में गहरी आस्था मजबूत हुई है। वहीं ध्यान रखना चाहिए कि भविष्य में बहुसंख्यक कश्मीरी समुदायों के हितों के साथ अल्पसंख्यक कश्मीरी ब्राह्मणों के हितों का संरक्षण भी किया जाए। जिन्हें कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा प्रमुख मुद्दा बनाये जाने के बाद भी न्याय नहीं मिला। उम्मीद करें कि विधानसभा चुनाव के बाद जब राज्य में चुनी हुई सरकार अस्तित्व में आए तो राज्य का दर्जा वापसी के बाद रोजगार व विकास के मुद्दों को प्राथमिकता मिले। इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में शांति देश के हित में है। जिसके लिये केंद्र से पर्याप्त सहयोग अपेक्षित है।
हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी हमलों की श्रृंखला ने शांतिपूर्ण मतदान को लेकर संशय पैदा कर दिया था। लेकिन चुनाव आयोग, राज्य प्रशासन व नेताओं द्वारा जनता को जागरूक करने का सकारात्मक प्रतिसाद मिला है। निष्कर्षत: कहा जा सकता है कुछ शिकवे-शिकायतों के बावजूद कश्मीर का जनमानस शांति व लोकतंत्र में विश्वास रखता है। बहुत सालों बाद कश्मीर में मतदाताओं की लंबी-लंबी कतारें दिखाई दी। ऐसा ही उत्साह हालिया लोकसभा चुनाव में दिखा था जब पिछले साढ़े तीन दशकों के मतदान का रिकॉर्ड टूटा था। इस बार का साठ फीसदी मतदान इसी कड़ी का विस्तार कहा जा सकता है। निश्चित रूप से इन चुनावों को ऐतिहासिक कहा जा सकता है। साथ ही यह उन विदेशी ताकतों को करार जवाब है जो कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण अपने निहित स्वार्थों के लिये करते रहे हैं। बहरहाल, साबित हुआ कि देश के अन्य भागों की तरह ही कश्मीर के लोग भी शांति व सुशासन चाहते हैं। वे भी महंगाई व बेरोजगारी से निजात चाहते हैं। इस चुनाव में उन्होंने अलगाववादियों को दरकिनार करके मतदान में उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुछ मुद्दों पर असंतोष के बावजूद लोगों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी की है। विचारों में यह असहमति लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि घाटी के लोगों की आकांक्षाओं की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र में गहरी आस्था मजबूत हुई है। वहीं ध्यान रखना चाहिए कि भविष्य में बहुसंख्यक कश्मीरी समुदायों के हितों के साथ अल्पसंख्यक कश्मीरी ब्राह्मणों के हितों का संरक्षण भी किया जाए। जिन्हें कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा प्रमुख मुद्दा बनाये जाने के बाद भी न्याय नहीं मिला। उम्मीद करें कि विधानसभा चुनाव के बाद जब राज्य में चुनी हुई सरकार अस्तित्व में आए तो राज्य का दर्जा वापसी के बाद रोजगार व विकास के मुद्दों को प्राथमिकता मिले। इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में शांति देश के हित में है। जिसके लिये केंद्र से पर्याप्त सहयोग अपेक्षित है।
निस्संदेह, राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय हितों को दलीय हितों से ऊपर रखना चाहिए। चुनाव के पहले चरण में मतदाताओं की लंबी-लंबी कतारें बताती हैं कि राज्य के लोग शांति व लोकतांत्रिक व्यवस्था के पक्ष में हैं। यह सुखद ही है कि ये चुनाव राज्य में चुनाव बहिष्कार की धमकियों व चेतावनियों से मुक्त शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए हैं। मतदाताओं ने ऐसी किसी भी आवाज को तरजीह नहीं दी है। एक बार फिर साबित हुआ है कि लोकतंत्र जनता की सक्रिय भागीदारी से ही महकता है।
स्वतंत्र पत्रकार ,मेरठ
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