उपज पत्रकार संगठन द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में चला कविताओं का जादू

- मिलावट में इतने आगे निकल गये, कीडे मारने की दवाई में भी कीडे पड गये

मेरठ। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स उपज पत्रकार संगठन द्वारा अन्नपूर्णा मंदिर के सभागार में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन का शुभारंभ डा कुमार प्रशांत मानव, पायल गोयल, ब्रजभूषण गुप्ता, अजय चौधरी, ललित ठाकुर, विश्वास राणा सहित सभी अतिथियों ने मां शारदे के सम्मुख द्वीप प्रज्ज्वलित व माल्यार्पण कर की।

   कार्यक्रम की विधिवत शुरूआत डा सुदेश यादव दिव्य ने सरस्वती वंदना से कुछ इस प्रकार की— दिया है मैया ने ज्ञान इतना, हरेक प्रतिभा दिखा रहा है। कोई सुरों को सजा रहा है, तो कोई पंचम में गा रहा है। नजीबाबाद से पधारे कवि डा प्रमोद शर्मा प्रेम ने कुछ इस प्रकार कहा— चलो लडना झगडना छोड दें हम। चलो नफरत की गर्दन तोड दें हम। रहे दिल में हमेशा देशहित ही, ख्यालों को कुछ ऐसा मोड दें हम। सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। दिल्ली से पधारे वरिष्ठ गीतकार डा जयसिंह आर्य ने अपने माहिये में कुछ इस प्रकार कहा— सिंहों का पानी लिख, अपने वीरों की बलिदान कहानी लिख। सुनाकर श्रोताओं में जोश भर दिया। बिजनौर से पधारे वरिष्ठ हास्य कवि हुक्का बिजनौरी ने देश में हो रहे भ्रष्टाचार पर व्यंग्य सुनाकर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया उन्होंने कहा— मिलावट के खेल में हम इतने आगे निकल गये, कीडे मारने वाली दवाई में भी कीडे पड गये। डा सुदेश यादव दिव्य ने मौजूदा देश के हालात को ध्यान में रखते हुये सुनाया कि आज हमारे देश को वीरों की आवश्यकता है उन्होंने कुछ इस अंदाज में अपनी बात कही— लाजपत सा कोई आज लाला नहीं, ना भगतसिंह सा कोई सरदार है। आजकल कोई अशफाक मिलता नहीं चन्द्रशेखर से वीरों की दरकार है। सुनाकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। वीर रस के कवि संजीव त्यागी ने अपनी ओजस्वी वाणी से कुछ इस अंदाज में कहा— है खुद्दारी सीने में वतन की दुश्मन को बता देना, गिरेगा जहाँ लहू मेरा, वो ही सरहद, बता देना। अगर लिपटकर आऊंगा मैं ध्वज तिरंगे में कभी तो, कोई पूछे मेरा मजहब तो हिन्दुस्तान बता देना। सुनाकर श्रोताओं जोश भर दिया। कवि विजय प्रेमी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कुछ इस प्रकार अपनी बात कही— नारों के अधिकार बेशर्म कफन खसोटू कर्म हुए, दो दो कोड़ी बिकने वाले आज हमारे धर्म हुए। मिल कर अर्थी उठा रहे हम अपने स्वाभिमान की। जड़ से उखड़ रही हैं सारी नीवें हिंदुस्तान की। सुनाकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। हास्य व्यंग्य के कवि विनय नोंक ने कुछ इस प्रकार से कविता सुनाई— पेट जो कराता है अहसास भूख और बेकारी का, दिखाता है रास्ता भीख और चकारी का। यही पेट जब भर जाता है, अय्याशी के हथकंडे बताता है शोषण के डंडे चलवाता है। सुनाकर देश में बढती बेरोजगारी पर तीखा व्यंग्य कसा। डा ईश्वर चंद गंभीर ने अपने मन की पीडा कुछ इस प्रकार बयां की— असल की खो गई पहचान अब तो, कबीरा हो गया अन्जान अब तो। सियासत आ गई साहित्य में जब, यहां बिकने लगे सम्मान अब तो। दिल्ली से पधारे कवि कृष्णा माल्या ने भी गजल सुनाकर खूब दाद बटोरी। कार्यक्रम के मुख्य प्रायोजक डा कुमार प्रशांत मानव थे व सह प्रायोजक ब्रजभूषण गुप्ता थे। कार्यक्रम का संयोजन डा सुदेश यादव दिव्य ने किया व संचालन विनय नोंक ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में अजय चौधरी, ललित ठाकुर, रवि ठाकुर, नरेश कुमार,अखिल गौतम, लियाकत मंसूरी, अरुण सागर राज, मनोज कुमार, जाकिर् तुर्क, शिवकुमार शर्मा, लोकेश कुमार, मनोज चौधरी, आदि का सहयोग रहा।

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