विपक्षी एकता की सुगबुगाहट
- अशोक उपाध्यायहिमाचल प्रदेश में राज बदल गया, पर रिवाज नहीं बदला और हर बार सरकार पलटने के रिवाज के तहत कांग्रेस फिर सत्ता में लौट आई। दिल्ली नगर निगम के चुनावों में आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को हराकर पहली जीत दर्ज की, लेकिन हिमाचल प्रदेश में उसके सारे प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। गुजरात में आप के नेता अरविंद केजरीवाल के लोकलुभावन वादे मतदाताओं को रिझाने में असफल रहे। उसे महज पांच सीटों से संतोष करना पड़ा और कांग्रेस को पीछे धकेलने का मंसूबा भी धरा का धरा रह गया।
हर चुनाव के बाद हार-जीत का राजनीतिक विश्लेषण होना स्वाभाविक है। एक बार फिर मोदी बनाम विपक्ष को लेकर नये समीकरण गढ़ने की कवायद शुरू हो गई है। बिहार की कुढ़नी विधानसभा सीट का उपचुनाव हारने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फिर से अपनी पुरानी सोच को बुलंद करने की शुरुआत की है और कहा है कि अगर सारा विपक्ष एकजुट हो जाये तो वह अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हरा सकता है। उन्होंने महागठबंधन के घटक राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है और विपक्ष को एकजुट करने का बीड़ा उठाने का मंतव्य जाहिर किया है।
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी कहा है कि कई राजनीतिक दल के मुखिया विपक्ष की एकता को लेकर बात कर रहे हैं। दोनों नेताओं के पूरे कथन में अगर-मगर, किंतु-परंतु की मजबूरियों को आसानी से देखा जा सकता है। कई संभावनाओं को लेकर समीकरण गढ़े जा सकते हैं लेकिन अब तक तीन बड़े मौकों पर विपक्ष सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के खिलाफ एकजुट होकर अपने मकसद में सफल रहा है लेकिन ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। पहला मौका था इमरजेंसी (आपातकाल), जब वामदलों को छोड़कर सभी राजनीतिक दल एकजुट हुए और जनता पार्टी का गठन हुआ। जनसंघ समेत कई राजनीतिक दलों के विलय के साथ बनी जनता पार्टी ने सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हराया और कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था।विपक्ष के लिये यह एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन जनता पार्टी ढाई साल भी नहीं टिक पाई। मोरारजी देसाई को हटाकर चौधरी चरण सिंह कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 23 दिन का समय दिया गया था, लेकिन ठीक एक दिन पहले 19 अगस्त, 1979 को इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया। संसद का एक दिन भी सामना किये बगैर चरण सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर लोकसभा चुनाव हुए और इंदिरा गांधी चुनाव जीत गईं और जनता पार्टी हार गई फिर टुकड़े-टुकड़े में बंट गई। दस साल बाद राजीव गांधी सरकार के कथित बोफोर्स घोटाले के मद्देनजर सारा विपक्ष एक बार फिर एकजुट हुआ और 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई। कांग्रेस छोड़कर आये विश्वनाथ प्रताप सिंह दो दिसंबर, 1989 को प्रधानमंत्री बने लेकिन विपक्ष की एकजुटता अंतर्कलह की शिकार हो गई। उनका शासन एक साल से कम चला और उन्हें 10 नवंबर, 1990 को इस्तीफा देना पड़ा। एक बार फिर कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और एकजुट विपक्ष बिखर गया। पुरानी कहानी दोहरायी गई और कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद चंद्रशेखर सरकार गिर गई। यह वह दौर था जब अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन चरम पर था।
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। बहुमत नहीं होने के कारण वाजपेयी को इस्तीफा देना पड़ा और विपक्ष को एकजुट रखने के लिये बने यूनाइटेड फ्रंट ने कर्नाटक के नेता एचडी देवेगौड़ा को संसदीय दल का नेता चुना और वह प्रधानमंत्री बने। इस बार भी यूनाइटेड फ्रंट बिखरने लगा और महज दस महीने में कांग्रेस की समर्थन वापसी के बाद देवेगौड़ा को इस्तीफा देना पड़ा। फिर 21 अप्रैल, 1997 को इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने लेकिन उनका हश्र भी देवेगौड़ा जैसे हुआ। लोकसभा चुनाव हुए और अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता चुने गये और 19 मार्च, 1998 को दोबारा प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार एक साल बाद लोकसभा में एक मत से हार गई, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में राजग स्पष्ट बहुमत हासिल करने में सफल रहा और उसने अपना कार्यकाल पूरा किया।
एकजुटता के नाम पर विपक्ष को एकजुट करने की कवायद अपने आप में जटिल है। वामदल राजनीति में पहले ही हाशिये पर जा चुका और उनके साथ कई क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक दायरा सिमटता जा रहा है। हर क्षेत्रीय दल की अपनी सीमाएं हैं और अधिकतर एक राज्य तक सीमित हैं। खुद नीतीश कुमार का जनता दल बिहार की सरहद पार नहीं कर पाया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल से बाहर नहीं निकल पाई। द्रमुक एवं अन्नाद्रमुक तमिलनाडु तक सीमित हैं। बीजू जनता दल ओडिशा तेलंगाना राष्ट्र समिति तेलंगाना और कांग्रेस वाईएसआर आंध्र प्रदेश तक सीमित हैं। दीगर बात यह है कि कोई अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहता है।वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के लिये नरेंद्र मोदी को जब भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तब उन्होंने वाराणसी और राजकोट से लोकसभा चुनाव लड़कर एक तीर से दो निशाने साधे थे। मोदी मूल रूप से गुजराती हैं फिर भी उन्होंने वाराणसी लोकसभा सीट को बरकरार रखने का फैसला किया और उनकी पकड़ गुजरात के साथ उत्तर प्रदेश पर भी बन गई। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभा चुनाव भी हैं, जिसमें मोदी के नेतृत्व में भाजपा लगातार दूसरी बार भारी अंतर से जीती। कहते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश और गुजरात की जीत से पूरे देश में बार-बार संदेश गया कि मोदी है तो मुमकिन है।कांग्रेस अपने खोये हुए जनाधार और पार्टी के अंतर्कलह से उबरने की कोशिश कर रही है और उसकी कमजोरी का फायदा खंडित विपक्ष भी उठाने में कोई कसर बाकी नहीं रखता है। खंडित विपक्ष के घटक दल कांग्रेस और वामदलों की जमीन पर पनपे और लंबे समय से फल-फूल रहे हैं। वे कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं दिखते। ऐसे में भाजपा के खिलाफ उनके मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना को फिलहाल दूर की कौड़ी ही माना जा सकता है।
(साभार)
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। बहुमत नहीं होने के कारण वाजपेयी को इस्तीफा देना पड़ा और विपक्ष को एकजुट रखने के लिये बने यूनाइटेड फ्रंट ने कर्नाटक के नेता एचडी देवेगौड़ा को संसदीय दल का नेता चुना और वह प्रधानमंत्री बने। इस बार भी यूनाइटेड फ्रंट बिखरने लगा और महज दस महीने में कांग्रेस की समर्थन वापसी के बाद देवेगौड़ा को इस्तीफा देना पड़ा। फिर 21 अप्रैल, 1997 को इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने लेकिन उनका हश्र भी देवेगौड़ा जैसे हुआ। लोकसभा चुनाव हुए और अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता चुने गये और 19 मार्च, 1998 को दोबारा प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार एक साल बाद लोकसभा में एक मत से हार गई, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में राजग स्पष्ट बहुमत हासिल करने में सफल रहा और उसने अपना कार्यकाल पूरा किया।
एकजुटता के नाम पर विपक्ष को एकजुट करने की कवायद अपने आप में जटिल है। वामदल राजनीति में पहले ही हाशिये पर जा चुका और उनके साथ कई क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक दायरा सिमटता जा रहा है। हर क्षेत्रीय दल की अपनी सीमाएं हैं और अधिकतर एक राज्य तक सीमित हैं। खुद नीतीश कुमार का जनता दल बिहार की सरहद पार नहीं कर पाया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल से बाहर नहीं निकल पाई। द्रमुक एवं अन्नाद्रमुक तमिलनाडु तक सीमित हैं। बीजू जनता दल ओडिशा तेलंगाना राष्ट्र समिति तेलंगाना और कांग्रेस वाईएसआर आंध्र प्रदेश तक सीमित हैं। दीगर बात यह है कि कोई अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहता है।वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के लिये नरेंद्र मोदी को जब भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तब उन्होंने वाराणसी और राजकोट से लोकसभा चुनाव लड़कर एक तीर से दो निशाने साधे थे। मोदी मूल रूप से गुजराती हैं फिर भी उन्होंने वाराणसी लोकसभा सीट को बरकरार रखने का फैसला किया और उनकी पकड़ गुजरात के साथ उत्तर प्रदेश पर भी बन गई। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभा चुनाव भी हैं, जिसमें मोदी के नेतृत्व में भाजपा लगातार दूसरी बार भारी अंतर से जीती। कहते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश और गुजरात की जीत से पूरे देश में बार-बार संदेश गया कि मोदी है तो मुमकिन है।कांग्रेस अपने खोये हुए जनाधार और पार्टी के अंतर्कलह से उबरने की कोशिश कर रही है और उसकी कमजोरी का फायदा खंडित विपक्ष भी उठाने में कोई कसर बाकी नहीं रखता है। खंडित विपक्ष के घटक दल कांग्रेस और वामदलों की जमीन पर पनपे और लंबे समय से फल-फूल रहे हैं। वे कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं दिखते। ऐसे में भाजपा के खिलाफ उनके मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना को फिलहाल दूर की कौड़ी ही माना जा सकता है।
(साभार)



No comments:
Post a Comment