कुछ जिम्मेदारी तो जनता की भी है
- कृष्ण कुमार निर्माण
शायद हम सब यह बात निसंकोच स्वीकार करेंगे कि वर्तमान दौर में तमाम राजनैतिक दलों को जनता की और जनता के मूल मुद्दों की कोई फिक्र नहीं है। पार्टी कोई भी हो, नेता कोई भी हो, यह सच है कि बेशक तमाम नेता जनता के हितों की बात करते हों मगर करते नहीं है। यदि करते होते तो जो आज जनता की हालात है, वह नहीं होती मसलन गरीबी बढ़ रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, स्वास्थ्य का ढांचा बेहतर नहीं है, शिक्षा तहस-नहस की जा रही है। सबसे बड़ा बाजार है शिक्षा, किसान द्वारा आत्महत्या करने का ग्राफ बढ़ रहा है, मजदूर बेहद परेशान हैं, महिला सुरक्षा बेहतर नहीं है, कानून का राज न होकर सिफारिश, पैसे और लठ का राज है। सार्वजनिक विभाग बेचे जा रहे हैं, कर्मचारी सकते में हैं। शिक्षित लोग रोजगार की बाट जोह रहे हैं।



सवाल यह है कि क्या इसके लिए केवल नेता और पार्टियां ही जिम्मेवार हैं? शायद! हम हाँ कहेंगे और सम्भवतः यह ठीक भी हो लेकिन जरा ध्यान से देखिए देश में लोकतंत्र है। अपनी पसंद की सरकार चुनने की आजादी है, जिस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। तो इस सवाल का एक उत्तर यह भी है कि कहीं ना कहीं जनता की जो ये हालात है, जो बनी है या बनाई जा रही है, उसके लिए खुद जनता भी जिम्मेवार है। हो सकता हम और आप इस बात से सहमत ना हो पर यह सच है या यों कह सकते हैं कि नेता और पार्टियों से ज्यादा हम जिम्मेदार हैं, जनता जिम्मेदार है,मतदाता जिम्मेदार है।
अब सवाल उठता है कि कैसे? बिल्कुल वाजिब सवाल है। पर इसी सवाल में उत्तर भी है और उत्तर यह है कि जैसा कि हमने लेख के शुरू में कहा है कि अपनी पसंद की सरकार चुनना लोकतंत्र में मतदाता की अपनी आजादी है,वो जिसे चाहे चुन सकता है मगर दुर्भाग्य कि जब भी अपनी सरकार चुनने का समय आता है तब हम मतदाता भी यकीनी तौर पर जात, धर्म, भाषा, इलाका, प्रांत, गली, मुहल्ला, गोत्र, रिश्ते-नाते, मित्रता, भीड़ में बंटकर वोट करते हैं।
माना कि तमाम पार्टी और उनके तमाम नेता इसी तरह के मुद्दों को उछालने का भरसक प्रयास करते हैं पर हम क्यों फंसते हैं?मतदाता फ्री की घोषणाओं में फंस जाता है, बोगस जुमलों में बह जाता है, यहाँ तक कि फ्री के दाल, चीनी, चावल और तेल के बहकावे में आसानी से आ जाता है। आखिर क्यों? ये तो वही बात हो गई कि सारे पक्षी एक सुर में गा रहें हैं कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा पर हम नहीं फसेंगे पर दुर्भाग्य देखिए कि यह बात सुनकर शिकारी डर जाता है मगर वह दाना डालता है और जाल फेंकता है और तमाम पक्षी वही बात दोहराते हुए जाल में फंस जाते हैं। शिकारी समझ जाता है ये सिर्फ रटन है, समझ नहीं और पक्षी निरंतर फंसते चले जाते हैं और वही बात दोहराते हुए अपनी नियति पर रोते रहते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि हम भी कहते तो है कि ये तमाम नेता लोग हमें उलझा रहे हैं, बहका रहे हैं, दाना डाल रहे हैं और हमारा शोषण कर रहे हैं, हमें इनके झूठे वायदों, जुमलों में नहीं फंसना है मगर जैसे ही चुनाव का वक्त आता है, हम इन्हीं में फंसे हुए दिखाई देते है जिसे आज के नेता और तमाम पार्टियां अच्छे से समझ और जान चुकी हैं। तभी तो मूल मुद्दों पर किसी का कोई ध्यान नहीं है, तभी तो झट से बोल देते हैं कि वो तो सब जुमला था, तभी तो खुद के द्वारा जारी घोषणा पत्र की एक लाइन भी पूरी नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि जब चुनाव होंगे तब इन्हें बहला लिया जाएगा।
कितना अच्छा हो कि हम देश की जनता, मतदाता इस तरह के छलावों में ना फंसे बल्कि दिल खोलकर तमाम पार्टियों और उनके नेताओं से सीधे सवाल करें कि छोड़िए ये धर्म और जात की बातें, इलाका-गोत्र, भाषा, प्रांत की बातें, सिर्फ इतना बताइए कि रोजी-रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा के मसले पर क्या राय है? क्या रोडमैप है? और उन तमाम लोगों का सिरे से बहिष्कार कर दें जो बांटने की, तोड़ने की बात करते हैं।
उन नेताओं और पार्टियों को हड़का दें जो केवल मुफ्त की चीज देकर हमें आलसी और मुफ्तखोर बनाने पर तुले हैं, उनसे पूछे कि इसे छोड़िए, आप यह बताइए कि गरीबी को कैसे खत्म करेंगे? हमें इस लायक कब और कैसे बनाएंगे कि खुद अपने पैरों पर खड़े हो पाएंगे और सम्मान की जिंदगी जियेंगे, अगर हम ऐसा कर पाए तो याद रखना इन तमाम नेताओं और पार्टियों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी और जनता के मूल मुद्दों पर इन्हें न केवल चुनाव लड़ेंगे बल्कि अपने वायदों को भी पूरा करेंगे पर दुर्भाग्य कि मतदाता ही बंट जाता है।
दोष केवल नेताओं का नहीं है, पार्टियों का नहीं है बस उन्होंने जनता की नब्ज पकड़ ली है जो अब जनता को छुड़वानी होगी और मुखरता से नेताओं और पार्टियों पर दबाब बनाना होगा तब जाकर कहीं ना कहीं हम आगे बढ़ पाएंगे। काश! हम ऐसा कर पाए तो निश्चित रूप से ये तस्वीर बदल जाएगी। तस्वीर बदले इसके लिए जागरुक होकर बदलना जरूरी है ताकि बदलाव आ सके।

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