बिन कहे भी मन के भेद, भावों से बाहर लाती हैं
सुख में बने दरिया सी, दुःख में कम हो जाती हैं
शान्ति में ये शांत हो जाये, गम में नम हो जाती हैं
निगाहें हैं! ये बिन कहे, सब कुछ कह जाती हैं।

शरम से ये झुकती नीचे, शान से ऊपर जाती हैं
गुस्सा में हो लाल ऐसे, सीधी भृकुटि तन जाती हैं
घोर वेदना से ये भीगे, सुर्ख नम हो जाती हैं
निगाहें है! ये बिन कहे, सब कुछ कह जाती हैं।



प्यार की भाषा ये समझती, निगाहें चार हो जाती हैं
अन्तर्मन की खींज ये जैसे,  बाहर लेकर आती हैं
निगाहें भी हैं बातें करती, इनकी भी भाषा होती हैं
निगाहें हैं ! ये बिन कहे, सब कुछ कह जाती हैं।

मन में आशा हो या निराशा सीधी से कह जाती हैं
प्यार भरी निगाहें तो सीधे, दिल में घर कर जाती हैं
निगाहें से कई घायल हुए, सीधे बार कर जाती हैं
निगाहें हैं ! ये बिन कहे, सब कुछ कह जाती हैं।
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- श्याम कुमार "कोलारे"
चारगांव प्रहलाद, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

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