प्रो. नंदलाल मिश्र
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से भारतवर्ष में विकास और परिवर्तन की गति में उछाल आया है। नई आर्थिक नीति उदारीकरण,भूमंडलीकरण और स्वतंत्र होते बाजार ने एक अलग किस्म की मायावी दुनिया को विकसित करने में सफलता हासिल की है। और उस इंद्रधनुषी जगत में जीने को हम विवश हैं।उससे अलग चलने में ढेरों समस्याएं आ खड़ी होती हैं।उसके साथ चलने में भी परेशानियां हैं और अलग चलने में उससे और अधिक। इसलिए आज का इंसान अजीबोगरीब दलदल में उलझा हुआ है।
आप थोड़ा रुक कर जब देखेंगे तो पाएंगे कि लोग अपने किये वादे को निभाने के लिए प्राण प्रण से कोशिश करते थे। समय के साथ साथ उनके वादे इरादे भी यूज़ एंड थ्रो जैसे हो गए।अब कोई अपनी ही कही हुई बातों को निभाने से बचना चाहता है। बहाने बनाकर निकल जाने का प्रयास करता है।मूल्यों में विश्वास कम हो गया लाभ हानि उस पर हावी हो गया। अब ऐसा समय चल रहा है कि व्यक्ति कोई लंबी योजना नहीं बनाना चाह रहा। पहले एक कहावत कही जाती थी-
पांचे आम पचीसे महुआ। तीस बरिस में इमली के फहुआ।।
यानि आम का पेड़ लगाएंगे तो वह पांच बरस बाद ही फल देगा। महुआ लगाएंगे तो वह पच्चीस बरस में फल देगा और यदि इमली लगाना चाहते हैं तो वह तीस बरस में फल देगा। अब कौन इमली लगाएगा जो तीस बरस में फलेगा। कोई नहीं। अब तो ऐसे पेड़ आने लगे जो एक बरस बाद ही फल देने लगे हैं अर्थात हाईब्रिड। तत्काल परिणाम चाहिए। हर देशी चीज की जगह हाइब्रिड ने ले लिया है जो त्वरित परिणाम देता है। त्वरित परिणाम की आश ने अनेक विषम परिस्थियों को जन्म दिया है।
आज गांवों को देखिए। आप पाएंगे कि गांव के पढ़े लिखे लोग विशेषकर नौकरी से जुड़े परिवारों का गाँव से लगभग पलायन हो गया है। उनके घरों में ताला लटक गया है। गांव की जमीन या तो बटाई पर दे दिया गया है या तो मोल पर। आप किसी तीज त्योहार पर जाते हैं तो वहां न तो कोई आपका साथी मिलता है या कोई पड़ोसी। दो चार दिन का समय काटना भारी पड़ता है।आठ दस घरों में बुजुर्ग दिखाई पड़ते हैं, जिनको या तो नौकर देखभाल करते हैं या वे स्वयं जीवन का अंतिम राह ढूँढ रहे हैं। अभिभावक परेशान हैं। किसी के दो बेटे किसी के तीन तो किसी का एक और वे सभी या तो सर्विस कर रहे हैं या तो गाँव से बाहर कोई कार्य। कोई गाँव मे रहना नही चाहता। इस कारण घरों में ताले लटके हैं। जिस घर मे बुजुर्ग हैं उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं।
अभिभावकों के मन में ये बाते बार बार उठती है कि बच्चों को उनका भविष्य बनाने के लिए उन्हें पढ़ाना लिखाना ठीक निर्णय था या उनसे कोई गलती हो गयी। उधर बाहर रहकर अपने बाल बच्चों के उदर भरण के लिए काम करने वाले लोगों को उतनी छुट्टियां नहीं मिल पाती कि वे घर पर रहकर अपने अभिभावकों की सेवा कर सकें। अभिभावक वृद्धावस्था में बच्चों के साथ रहना पसंद नहीं करते क्योंकि वहां उनका मन नही लगता। वहाँ की आबोहवा उनके मुताबिक नहीं होती और कहीं कहीं तो बेटे बहुओं से ही उनका तालमेल नही बैठ पाता।आज वो अभिभावक ज्यादा खुश हैं जिनका एक बच्चा उनके साथ रहता है। पहले घर पर जब मेहमान आते थे तो पूरा परिवार उनके आने से खुश और व्यस्त रहता था पर अब मेहमान बोझ लगने लगे।किसी के मन मे सेवा और सम्मान का वह भाव नहीं रहा।
हर अभिभावक अपनी लड़कियों को भी पढ़ा रहा है कि उसका जीवन आसान हो जाये। पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाय। जब वह अपने ससुराल जाती है तो वह रसोईघर से तौबा करना चाहती है। चाहती है कि नौकरानी रख ली जाय, लेकिन जब किसी की बेटी को घर पर बहू बनाकर लाते हैं तो चाहते हैं कि वह छत्तीस व्यंजन बनाकर खिलाये। यह अंतर्विरोध समाज को किधर ले जा रहा है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। जब परिवार की अवधारणा बनी होगी तो कुछ नियमो को भी गढ़ा गया था। अब उन नियमों की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न खड़ा है। परिवार बिखर रहे हैं। नियम टूट रहे हैं।नित नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं। परिवार कौन स्वरूप धारण करेगा यह देखना होगा। क्योंकि अब महिलाएं घरों तक कैद होकर रहना नही चाहतीं।
न गृहम गृहम इत्याहू गृहिणी गृहम उच्यते। कहा जाता था कि वह घर घर नहीं जिसमें गृहिणी न हो। गृहिणी घर में अब किस रूप में रहेगी धीरे धीरे तस्वीर साफ हो रही है। संयुक्त परिवार का दायित्व निभाना अब बूते की बात नहीं। जब तक शारीरिक आकर्षण बरकरार रहेगा तब तक एक पुरुष और एक महिला साथ साथ रहेंगे या फ्रायड के शब्दों में कहें कि जब तक लिबिडो की मौजूदगी रहेगी तब तक आकर्षण रहेगा उसके बाद पति अपना और पत्नी अपने तरीके से अपनी जिंदगी जीयेगी। परिवार स्वप्न हो जाएगा।
अंतर्द्वंद्व में जीते अभिभावकों को उससे निकलने की जरूरत है।क्योंकि उनके बच्चों की पीढ़ी किसी उलझन में नहीं होगी। उनके तरीके इस पार या उस पार वाले हैं। उनके मूल्य भी अलग हैं जिनमें संकोच और संवेदना बहुत देर के लिए टिकाऊ नही हैं। ऐसे में अभिभावक अंदर के संघर्ष को लंबे समय तक क्यों झेलें। अपनी जिंदगी में सकून पानेके के लिए उन्हें अपनी थाती की तरफ लौट जाना चाहिए।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय
विश्वविद्यालय चित्रकूट सतना (मप्र)।

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