शिवचरण चौहान
गूलर का फूल होना एक मुहावरा है। गूलर का फूल होना यानी दुर्लभ होना। कहते हैं गूलर का फूल अमावस्या अथवा पूर्णमासी की रात को खिलता है और खिलते ही आसमान में विलीन हो जाता है। देवलोक चला जाता है। अगर कोई मनुष्य गूलर के पेड़ का फूल देख ले तो वह अति भाग्यशाली माना जाता है। सुख समृद्धि कीर्ति उसके घर में सहज ही आ जाती है। वह बहुत धनवान हो जाता है।
कुछ लोगों का कहना है की गूलर में फूल आते ही नहीं हैं सीधे फल आता है जो पेड़ के तने पर या फिर टहनी पर लगता है। कुछ लोग कहते हैं कि गूलर, पाकड़, कटहल के पेड़ पर फूल आते ही नहीं है। इनके फूल फल, सामान्य फूल फल नहीं हैं। ये तो तने की गांठ हैं। फल नहीं। पर इनके अंदर बीज क्यों होते हैं कोई बता नहीं पाता। गूलर के पेड़ से मिलता जुलता एक पेड़ होता है अंजीर का पेड़। अंजीर का पेड़ लगभग गूलर के पेड़ जैसा ही होता है और उसमें भी फल आते हैं जैसे गूलर में आते हैं। अनेक लोग दोनों को एक ही वृक्ष समझते हैं।



   अंजीर के फल भी गूलर की तरह तने अथवा डाल पर ही लगते हैं। अंजीर के फल पर वैज्ञानिकों ने शोध किया है। पर गूलर और पाकड़ पेड़ के फलों की वही प्रक्रिया है जो अंजीर की है। अंजीर फारसी का शब्द है। गूलर हिंदी का, संस्कृत में गुर्जर को गुदुंबर, उदुंबर अथवा  जंतु फल, क्षीर वृक्ष, हेमदुग्ध , हमूर कहते हैं। यह मोरेसी कुल का वृक्ष है। गूलर का वैज्ञानिक नाम फाइकस रासेमोसा है। अंग्रेजी में इसे कलस्टर फिग कहते हैं। छत्तीसगढ़ का यह लोकप्रिय पेड़ है। छत्तीसगढ़ में इसे डूमर कहते हैं।



   गूलर के फूल के तमाम किस्से हमारी लोक कथाओं, लोकगीतों और जन श्रुति में भरे पड़े हैं। अवधी, भोजपुरी, बृज, बुंदेलखंडी छत्तीसगढ़ी आदि लोक भाषाओं में गूलर के गीत गाए जाते हैं। महुआ और गूलर के फल प्राचीन काल में गरीब लोग भूख मिटाने के लिए खाते थे इनके फल की रोटियां बनाते थे।अंजीर में तो साल भर फल आते ही रहते हैं पर गूलर के पेड़ पर साल में दो बार फल आते हैं। एक बार होली के आसपास और एक बार दीपावली के आसपास। बंदर गिलहरियां, कौवे बुलबुल धनेश, मैं ना, गला र अधिकांश पंछी गूलर के फूल अथवा अंजीर के फल आते ही खाने पर टूट पड़ते हैं।  गिलहरी के लिए तो गूलर का फल ही रसगुल्ला होता है ऐसी कहावत लोक जन में प्रचलित है।



वैज्ञानिकों का कहना है कि जब गूलर का फल तने अथवा डाल में लगता है तो वह हरे रंग का होता है। फल के अंदर छोटे-छोटे घुंडी नुमा फूल आते हैं। इनमें नर फूल और मादा फूल होते हैं। मादा फूल कुछ सक्रिय और कुछ निष्क्रिय होते हैं। गूलर में फल आते ही एक छोटा कीट गूलर अथवा अंजीर के फल में छोटा सा छेद कर घुस जाता है और मादा कीट गूलर के फल के अंदर मादा फूल पर अपने अंडे रख देती है। अंडों से नर और मादा कीट निकलते हैं  जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में भुनगा कीट कहते हैं। नर और मादा कीट का मिलन गूलर के फूल के अंदर होता है। मादा से समागम करने के बाद नर भूनगा कीट गूलर के फूल के अंदर ही मर जाता है वह फूल के बाहर नहीं आ पाता। जबकि गर्भवती होने पर मादा कीट गूलर के फल में छेद कर बाहर निकल आती है और दूसरे फल छेद कर घुस जाती है और वहां पर गूलर के फूल पर अपने अंडे देती है। इस तरह गूलर के फूल का आपस में परागण भी मादा कीट करती है। गूलर के फूल और मादा कीट के वंश में लाखों की संख्या में वृद्धि होती है।
यह प्रक्रिया लाखों साल से होती चली आ रही है। बरगद और पकरिया जिसे पाकड़ का पेड़ कहते हैं इसी कुल के वृक्ष हैं और उनके  फूलों, फलों का परागण भीम असंख्य भुनगा कीट करते हैं। बरगद, पाकड़ और गूलर के फूलों फलों का परागण भी असंख्य भुनगा कीट ही करते हैं। भुन गा कीट सैकड़ों की संख्या अंडे बच्चों के साथ गूलर पाकड़ और बरगद के फलों के अंदर भरे रहते हैं। फल तोड़कर उसे काटने पर ढेर के ढेर भुनगे निकलते हैं।
वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि फल के अंदर ही अंजीर, गूलर, बरगद और पाकड़ के फूल होते हैं जिन्हें कोई खिलते हुए देख नहीं पाता। आम पेड़ पौधों की तरह इनके फूल डाल पर नहीं खिलते हैं। इनकी परागण प्रक्रिया अलग है जो प्रकृति ने बनाई है।
गूलर की जड़, छाल और पत्ते आयुर्वेद में औषधि बताए गए हैं। गूलर की जड़ ताबीज में भरकर गले में पहनने पर ग्रहों की शांति होती है और मनुष्य धनवान बनता है ऐसी मान्यता लोक जीवन में है। गूलर का फल खाने से खून बढ़ता है और रक्त विकार दूर होता है। गूलर बरगद और पाकड़ के फल मनुष्य की आंखों की रोशनी बढ़ाने हैं। घाव भरने में मदद करते हैं। पेट दर्द और अतिसार में लाभ होता है। वैद्य गूलर के फल, पत्ते और छाल से अनेक दवाएं बनाते हैं। गूलर के सूखे फल भी बहुत काम आते हैं जिनसे कई घरेलू दवाइयां ब नाई जाती हैं।
 गूलर, बरगद और पाकड़ के पेड़ के तने डालियों और कच्चे फल में चीरा लगाने पर दूध निकलता है। यह दूध बहुत लाभकारी होता है और आयुर्वेद की कई दवाइयों के निर्माण में काम आता है। बरगद का दूध तो बहुत लाभकारी होता है और शिकारी बरगद के दूध में सरसों का तेल मिलाकर लासा बनाते हैं जिससे पंछी पकड़े जाते हैं।

(लेखक स्वतंत्र विचारक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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