जानता हूँ मुझसे दूर हो गयी हो तुम
इस बात पर अब भी यकीं करना बाक़ी है।
अपने दर्द को ही दवा बना लिया है मैंने
बस अब ग़मी में भी खुश रहना बाक़ी है।



खुल कर हंसे हुए हो गए हैं एक अरसे
अब तो लब पर बस फ़ीकी मुस्कान बाक़ी है।
यूँ तो जीना कब का छोड़ दिया है मैंने
अब तो बस जिम्मेदारियां निभाना बाक़ी है।

हर ज़र्रे-ज़र्रे से अब भी पूछता हूं मैं तेरा पता
कभी तो लौट आओगी यह आस अब भी बाक़ी है।
तुम्हारे जाने से एक खालीपन-सा है जीवन में
तुम्हारे ख़्वाब संग जीवन को साकार करना बाक़ी है।

भीड़ में भी हरपल पाता हूँ तन्हा मैं खुद को
संग बिताए लम्हों के ही अब तो जीना बाक़ी है।
नही ले सकता कोई तुम्हारी जगह मेरी ज़िंदगी में
तुम जान हो मेरी यह एहसास अब भी बाक़ी है।
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- नृपेन्द्र अभिषेक नृप

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