- ज़ाहिद ख़ान
महल कॉलोनी, शिवपुरी (मप्र)

सर्वोच्च न्यायालय ने एक हालिया आदेश में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अपने-अपने यहां ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ व्यवस्था को लागू करने को कहा है। राज्य सरकारों को निर्देश देते हुए उसने कहा, ‘‘यह उन प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए है, जिन्हें इसके जरिये हर राज्य में राशन मिल सकता है।’’ अदालत का इस बारे में साफ-साफ कहना था, ‘‘वह इस बात से चिंतित है कि जिन प्रवासी श्रमिकों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, वे कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कैसे उठा पाएंगे ?’’ शीर्ष अदालत ने इसके अलावा केन्द्र सरकार से भी जवाब तलब किया, ‘‘राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने के लिए असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों के पंजीकरण के लिए सॉफ्टवेयर विकास में देरी क्यों हो रही है ?’’



इस मामले में सरकार की हीलाहवाली पर अपना कड़ा रुख जताते हुए उसने कहा, ‘‘आपने इसे पिछले साल अगस्त में शुरू किया था और यह अभी भी खत्म नहीं हुआ है।’’ जब केन्द्र सरकार ने इसके लिए और मोहलत मांगी, तो अदालत ने नाराज होते हुए कहा, ‘‘आपको अभी भी तीन-चार महीने की आवश्यकता क्यों है ? आप कोई सर्वेक्षण नहीं कर रहे हैं। आप केवल एक मॉड्यूल बना रहे हैं, ताकि उसमें डेटा डाले जा सकें।’’ अदालत की यह नाराजगी वाजिब भी है।
‘एक देश-एक राशन कार्ड’ योजना को पूरे देश में अमल में आए दो साल और असंगठित क्षेत्र के कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने के काम में एक साल पूरा होने को आया, मगर न तो ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ योजना देश के सभी राज्यों में लागू हो पाई और न ही राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार हो पाया। यदि राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार हो जाता, तो उन प्रवासी श्रमिकों को इस योजना का फायदा मिल जाता, जो अपने राज्यों को छोड़कर दूसरे राज्यों में अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह की अवकाशकालीन पीठ मानव अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोकर की एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिसमें प्रवासी श्रमिकों के लिए खाद्य सुरक्षा, नकद अंतरण, परिवहन सुविधाएं और अन्य कल्याणकारी उपायों को जमीनी सतह पर लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश देने का आग्रह किया गया है। याचिका में कहा गया है कि श्रमिकों को इन चीजों की सख्त जरूरत है, क्योंकि देश के ज्यादातर हिस्सों में लागू कोरोना कर्फ्यू की वजह से उनके सामने इस बार संकट कहीं ज्यादा गंभीर है। बहरहाल, अदालत ने मामले में सुनवाई करते हुए केंद्र से कैफियत चाही कि ‘‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत इस साल नवंबर तक उन प्रवासी श्रमिकों को मुफ्त खाद्यान्न कैसे मिलेगा, जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं ?’’ इस पर केन्द्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि ‘‘राज्यों को 8 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न दिया गया है। अब संबंधित राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त योजनाएं तैयार करनी है कि ‘गरीब कल्याण योजना’ के तहत प्राप्त आपूर्ति सभी लाभार्थियों तक पहुंचे।’’ पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को सुनने के बाद कहा कि वह गरीब कल्याण योजना को अस्थायी रूप से उन लोगों के लिए भी विस्तारित करने पर विचार करे, जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं।
शीर्ष अदालत ने इससे पहले 24 मई को दिए निर्देश का उल्लेख करते हुए कहा कि असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए और राज्य सरकारों के समन्वय से एक सामान्य राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाना चाहिए। इस दौरान अदालत ने कहा था कि प्रवासी कामगारों के पंजीकरण की प्रक्रिया बेहद धीमी है और इसमें तेजी लाई जानी चाहिए। ताकि उन्हें कोविड-19 महामारी के बीच योजनाओं का लाभ दिया जा सके।
कहने को अगस्त, 2019 से पूरे देश में ‘एक देश एक राशन कार्ड’ योजना अमल में आ गई है। 32 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में यह योजना लागू है। योजना के अंतर्गत किसी भी क्षेत्र के नागरिक राशन कार्ड के माध्यम से देश के किसी भी राज्य से पीडीएस राशन की दुकान से राशन प्राप्त कर सकते हैं। योजना को लागू करने के लिए सभी पीडीएस दुकानों पर पीओएस मशीनें लगाई जाना है। जैसे ही राज्य सभी पीडीएस दुकानों पर पीओएस मशीन की रिपोर्ट देंगे, वैसे ही उन्हें ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ योजना में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन अफसोस, दिल्ली, असम, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल ने इसे अपने यहां लागू नहीं किया है। जिन राज्यों ने इसे लागू किया है, उनमें से कुछ राज्यों में पीडीएस दुकानों पर पीओएस मशीनें नहीं लगाई हैं। योजना को लागू करने में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। इस योजना में ई-पीओएस मशीनों का इस्तेमाल होता है। जिसके संचालन के लिए कनेक्टिविटी की शिकायतें आम हैं। कनेक्टिविटी की समस्या के चलते सुदूर स्थानों में जिस उपभोक्ता को इसका फ़ायदा लेना है, उसकी पहचान करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
जिन राज्यों में ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ योजना लागू नहीं हुई है, उनमें दिल्ली भी एक है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार, घर-घर राशन पहुंचाना चाहती है। इसके लिए उसने एक योजना बनाई है। बीजेपी इस योजना का विरोध कर रही है। उसका दावा है कि दिल्ली सरकार की प्रस्तावित घर-घर राशन पहुंचाने की योजना में ईमानदारी और प्रमाणिकता का अभाव है। राजधानी में आधार कार्ड प्रमाणीकरण की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ सेल कम्प्यूटरीकृत प्रणाली लागू है।
जाहिर है केन्द्र और राज्य सरकार के इस टकराव में नुकसान आम आदमी का हो रहा है। खास तौर से प्रवासी मजदूरों का। जिन्हें ‘एक देश एक राशन कार्ड’ योजना का फायदा नहीं मिल पा रहा है। एक अहम बात और, ‘एक देश एक राशन कार्ड’ योजना का लाभ लेने के लिए लाभार्थी का राशन कार्ड, आधार कार्ड से जुड़ा होना चाहिए, क्योंकि पीडीएस के लाभार्थियों की पहचान, उनके आधार कार्ड पर इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ सेल (ई-पीओएस) से की जाती है।
पिछले साल केंद्र सरकार ने आधार कार्ड से जुड़े नहीं होने के चलते करीब तीन करोड़ राशन कार्ड रद्द कर दिए थे। राशन आपूर्तियों से वंचित किए जाने की वजह से कुछ लोगों की मौत भी हुई थी। मामला, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा था। जिस पर अदालत ने केंद्र सरकार एवं सभी राज्य सरकारों से जवाब मांगा था। ऐसे लोगों की ही दिक्कतों के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने को कहा था। ताकि राशन कार्ड न होने की वजह से वे कल्याणकारी योजनाओं से वंचित न हो जाएं।

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