बदलती जीवन शैली के घातक दुष्परिणाम
- प्रो. नंदलाल
भारतीय लोगों की जीवन शैली बहुत तेजी से बदल रही है। यह शैली नानाविध परेशानियों को भी जन्म दे रही है। रोगों में बहुत उछाल आया है और यह एकदम स्पष्ट हो चला है कि हमारी जीवन शैली ही हमारे दुखों के लिए जिम्मेदार है। रोग अपने आप नहीं बढ़ रहे हैं अपितु हमारी जीवन शैली इस कदर बिगड़ चुकी है उसे होना ही होना है। फिर क्या हम जान बूझकर रोगों को खरीद रहे हैं या हमारी मस्तिष्कीय आदतें इतनी प्रबल हो चुकी हैं कि यह ज्ञात होने पर भी कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, दारू पीना खतरनाक है फिर भी लोग धड़ल्ले से सिगरेट और दारू पी रहे हैं। यह कौन सी मजबूरी है। यही मजबूरी आज की नई पीढ़ी में अधिकांश लोगों में घर कर गई है। यह किसी विशेष कौम या जाति में नहीं है अपितु पूरे समाज में उन तक पहुंच गई है जो पढ़ रहे हैं, जो उच्च पदों पर कार्यरत हैं।मजदूर वर्ग में तो यह पहले से ही घुस गया था पर पढ़े लिखे लोग भी इसका शिकार हो रहे हैं। अनेकों प्रकार के नशीले पदार्थों ने युवा पीढ़ी को अपने नियंत्रण में ले लिया है।
भारतीय जीवन शैली अत्यंत संतुलित और स्वास्थ्य कारक रही है जिसको हमारे मुनियों और ऋषियों ने निर्धारित किये थे। भारतीय समाज उसी व्यवस्था से चलता रहा और आज भी बहुत लोग ऐसे हैं जो उसी राह पर चल रहे हैं। लेकिन आधुनिकता और प्रौद्योगिकी के आ जाने के कारण लोगों का चिंतन भौतिकवाद की तरफ बढ़ गया है। यह तो था ही ऊपर से सूचना क्रांति ने विभिन्न वैश्विक संस्कृतियों को बुरी तरह प्रभावित किया है। सनातन संस्कृति भी इससे अछूती नहीं है। नई पीढ़ी के समक्ष प्रत्यक्ष सभी संस्कृतियों के गुण और दोष उपस्थित हैं।जिसको जो बातें अच्छी लग जाय वह उसे अपने जीवन में अपना लेता है और उस पर वह अपना तर्क भी प्रस्तुत करता है। इस तरह विभिन्न संस्कृतियों की खिचड़ी अब पक रही है किसी को अच्छा लगे न लगे, रास्ता तो तय करना ही होगा।
मैने अनेक जगहों पर व्याख्यान के दौरान उच्च कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से एक सवाल जरूर पूछा है कि कितने छात्र ऐसे हैं जो रोज उगते हुए सूरज को देखते हैं। बमुश्किल दस से पंद्रह प्रतिशत छात्रों का उत्तर हाँ मिलता है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि नई पीढ़ी जो देश का भविष्य है उसके सोने और जागने का समय निश्चित नहीं है। और जिस व्यक्ति के सोने और जागने का समय यदि निश्चित नहीं है वह किस तरह स्वस्थ रह सकेगा और जिसका स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा वह स्वयं और औरों के लिए क्या कर सकता है। यह एक छोटा उदाहरण है। इस तरह के अनेक कृत्य हैं जो विकृत जीवन शैली की तरफ इशारा कर रहे हैं और भारतीय युवा उच्च रक्तचाप और शुगर के रोगी बन रहे हैं।कम उम्र में हृदय रोग ,कब्जियत, पेप्टिक अल्सर, अस्थमा, दुश्चिंता,दुर्भिति,उन्माद,तना व, कुंठा,अवसाद के रोगी बन रहे हैं।ये घातक बीमारियां है जो आजकल के युवाओ को अपने आग़ोश में ले रही हैं।ये मात्र गलत जीवन शैली, प्रदूषित वातावरण, और आरामतलब जीवन शैली के कारण तेजी से बढ़ रही हैं।
नशा सेवन, गुटका खाना, शराब पीना, गांजा पीना, सिगरेट पीना, बीड़ी पीना ये कॉमन हो चला है। महिलाएं जो नशा का सेवन करती हैं उनके लिए अलग से व्यवस्थित व्यवस्था की जा रही है ताकि किसी प्रकार का डिस्टर्बेंस न हो। यह पीढ़ी कहां जा रही है। ये जा रही है वैश्विक खिचड़ी संस्कृति के तरफ। कुल मिलाकर स्थिति यह निर्मित हो रही है कि हमारी जीवन चर्या असंतुलन के तरफ जा रही है और हम असमय काल के गाल में समाते चले जा रहे हैं। प्रश्न उठता है कि इसका समाधान क्या है। इस पर नियंत्रण किस तरह पाया जाय। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि क्या वास्तव में सरकार और समाज दोनों इस पर नियंत्रण करना चाह रहे हैं क्या? यदि समाज और सरकार दोनों यह निर्धारित कर लें कि नशा मुक्त भारत बनाना है तो इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बिहार सरकार ने शराब बंदी लागू कर दी।नतीजा यह निकला कि दारूबाजों की संख्या बढ़ गई। सीमावर्ती राज्यों से शराब की ब्लैक मार्केटिंग होने लगी।रह रह कर तमाम राज्य सरकारे गुटखा पर पाबंदी लगाईं। एक दो महीने बाद वही गुटखा जो एक रुपये में मिलता था वह आठ रुपए में बिकने लगा। धड़ल्ले से मार्केट में मिलने लगा।ऐसे प्रतिबंध का क्या मतलब।क्या ऐसे निर्णयों से नशाखोरी रुकेगी नहीं वह बढ़ती चली जाएगी।





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