ISRO की बड़ी कामयाबी: 36,000 किमी ऊपर पहुंचा EOS-05

चीन-पाक सीमा समेत बड़े इलाके की लगातार करेगा निगरानी

श्रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने गुरुवार देर रात 2:55 बजे एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए EOS-05 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित करने की दिशा में भेज दिया। सैटेलाइट को GSLV-F17 रॉकेट के जरिए श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के सेकेंड लॉन्च पैड से लॉन्च किया गया।

EOS-05 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई वाली जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से बड़े इलाकों की बार-बार तस्वीरें लेने में सक्षम होगा। इससे भारत और उसके आसपास के क्षेत्रों की लगातार निगरानी की जा सकेगी।

पाकिस्तान-चीन सीमा और रणनीतिक इलाकों पर नजर

EOS-05 का इस्तेमाल भारत की सीमाओं और रणनीतिक क्षेत्रों की निगरानी में भी किया जा सकेगा। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन से लगी सीमाओं पर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने में इसकी अहम भूमिका हो सकती है।

हालांकि, इसकी प्राथमिक ताकत बेहद बारीक तस्वीरें लेना नहीं, बल्कि बहुत बड़े क्षेत्र की बार-बार इमेजिंग करना है। इससे किसी इलाके में समय के साथ होने वाले बदलावों का पता लगाने में मदद मिलेगी।

आपदा से पहले चेतावनी देने में मदद

सैटेलाइट से मिलने वाले इमेजिंग डेटा का इस्तेमाल चक्रवात, भारी बारिश, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए किया जा सकेगा। लगातार तस्वीरें मिलने से आपदा प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का तेजी से आकलन करने और राहत-बचाव अभियानों की योजना बनाने में मदद मिलेगी।

18 मिनट में ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचा

GSLV-F17 ने लॉन्च के करीब 18 मिनट बाद EOS-05 को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (सब-जीटीओ) में पहुंचाया। इसके बाद सैटेलाइट को अपनी अंतिम कक्षा तक पहुंचाया जाएगा, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 36 हजार किलोमीटर ऊपर होगी।

GSLV-F17, भारत के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल कार्यक्रम की 19वीं उड़ान थी।

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट क्यों खास है?

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट पृथ्वी से करीब 35,786 किलोमीटर की ऊंचाई पर होती है। इस कक्षा में सैटेलाइट पृथ्वी के एक चक्कर को लगभग 24 घंटे में पूरा करता है। इससे वह पृथ्वी के घूमने की गति के साथ तालमेल बनाए रख सकता है।

इसके मुकाबले लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) पृथ्वी के काफी करीब होती है और सामान्य तौर पर 2,000 किलोमीटर से कम ऊंचाई पर होती है। वहां सैटेलाइट तेजी से पृथ्वी का चक्कर लगाता है और किसी एक क्षेत्र के ऊपर सीमित समय के लिए ही रहता है।

EOS-05 के लिए जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का फायदा यह है कि यह भारत और आसपास के बड़े हिस्से की लगातार निगरानी कर सकेगा।

दो मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजर करेंगे काम

EOS-05 में दो मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजर लगाए गए हैं। ये कैमरे अलग-अलग प्रकाश तरंगों में पृथ्वी की तस्वीरें लेते हैं। इससे जमीन, वनस्पति, जल और पर्यावरण में होने वाले बदलावों का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

इनमें से एक इमेजर की रिजॉल्यूशन 42 मीटर प्रति पिक्सल बताई गई है। यानी तस्वीर का एक पिक्सल जमीन के लगभग 42×42 मीटर क्षेत्र की जानकारी देता है।

इसलिए EOS-05 की खासियत किसी छोटी वस्तु की बेहद बारीक तस्वीर लेना नहीं, बल्कि बहुत बड़े क्षेत्र की नियमित इमेजिंग करना है।

2021 में GISAT-1 मिशन हो गया था फेल

भारत इससे पहले जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग रियल-टाइम इमेजिंग के लिए GISAT-1 मिशन की योजना बना चुका था।

अगस्त 2021 में GSLV-F10 के जरिए GISAT-1 को लॉन्च करने की कोशिश की गई थी, लेकिन क्रायोजेनिक स्टेज में तकनीकी समस्या आने के कारण मिशन सफल नहीं हो पाया था।

पिछले दो लॉन्च में मिली थी असफलता

EOS-05 की सफलता ऐसे समय में आई है, जब ISRO के पिछले दो प्रमुख लॉन्च मिशन असफल रहे थे।

PSLV-C62: 12 जनवरी 2026 को यह रॉकेट DRDO के 'अन्वेषा' उपग्रह और 15 अन्य सह-यात्री उपग्रहों को लेकर रवाना हुआ था। तीसरे चरण में समस्या आने के कारण मिशन सफल नहीं हो सका।

PSLV-C61: 18 मई 2025 को EOS-09 को कक्षा में स्थापित करने के उद्देश्य से लॉन्च किया गया था। तीसरे चरण में कम्बशन चैंबर का दबाव अचानक गिरने के कारण मिशन असफल रहा था।

ISRO का छह और मिशन लॉन्च करने का लक्ष्य

ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने कहा है कि संगठन का इस वर्ष छह और मिशन लॉन्च करने का लक्ष्य है। EOS-05 का प्रक्षेपण करीब आठ महीने बाद ISRO का अगला बड़ा मिशन है और इसकी सफलता अंतरिक्ष एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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