न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026: समग्र विवेचन
- रविकांत राऊत
न्याय व्यवस्था में सबसे खतरनाक देरी वह नहीं होती जिसमें फैसला देर से आता है। उससे भी खतरनाक वह स्थिति है जिसमें नागरिक को यह समझ में ही नहीं आता कि उसकी शिकायत का दरवाजा आखिर किसके पास है।
भारत ने विशिष्ट न्याय के लिए न्यायाधिकरण बनाए थे। विचार अच्छा था। हर विवाद को सामान्य अदालतों की लंबी कतार में खड़ा करने के बजाय कर, सेवा, कंपनी, ऋण, दूरसंचार और दूसरे विशेषज्ञ क्षेत्रों के लिए ऐसे मंच हों जहाँ विषय की समझ रखने वाले लोग अपेक्षाकृत तेजी से फैसला कर सकें। लेकिन समय के साथ एक विडंबना सामने आई। जिन संस्थाओं को न्याय को तेज और विशेषज्ञ बनाने के लिए बनाया गया था, उनकी अपनी स्वतंत्रता और प्रशासन ही विवाद का विषय बन गया।
इसी पृष्ठभूमि में न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 महत्वपूर्ण है। राज्यसभा ने मंगलवार को इसे पारित कर दिया, जबकि लोकसभा इसे एक दिन पहले पारित कर चुकी थी। विधेयकका सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन है, जो विभिन्न न्यायाधिकरण में नियुक्तियों, सेवा शर्तों और संस्थागत निरीक्षण के लिए एक समान ढांचा तैयार करेगा। कागज पर यह एक प्रशासनिक सुधार दिखाई देता है। असल में यह उससे कहीं बड़ा सवाल है कि न्याय देने वाली संस्था आखिर किसके प्रति जवाबदेह हो और किससे स्वतंत्र रहे?
यही वह जगह है जहाँ ट्रिब्यूनल की कहानी भारतीय लोकतंत्र की बड़ी कहानी बन जाती है। न्यायाधिकरणोंको अदालतों का विकल्प नहीं, बल्कि विशिष्ट न्याय का माध्यम माना गया था। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण जैसे संस्थान ने इस मॉडल की उपयोगिता साबित भी की। लेकिन धीरे-धीरे नियुक्ति, कार्यकाल, सेवा शर्तें और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद बढ़ते गए। न्यायपालिका ने बार-बार यह सवाल उठाया कि यदि कोई ट्रिब्यूनल सरकार के फैसले की समीक्षा कर रहा है, तो उसके प्रशासन और नियुक्तियों पर उसी एक्ज़ीक्यूटिव का अत्यधिक प्रभाव कैसे स्वीकार किया जा सकता है।
यह प्रश्न केवल न्यायाधीशों या वकीलों का नहीं है। मान लीजिए किसी सरकारी कर्मचारी का पेंशन विवाद है। किसी कंपनी का कर विवाद है। किसी बैंक के ऋण की वसूली का मामला है। किसी विनियमित क्षेत्र में किसी नागरिक या संस्था का अधिकार विवादित है। उस व्यक्ति के लिए ट्रिब्यूनल कोई संवैधानिक सिद्धांत नहीं है। वह एक कमरा है, कुछ अधिकारी हैं, एक फ़ाइल है और एक तारीख है। उसके लिए न्याय का अर्थ है: मेरी बात कब सुनी जाएगी?
यहीं भारत की ट्रिब्यूनल व्यवस्था की दूसरी समस्या सामने आती है, स्वतंत्रता के साथ सामर्थ्य की।
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण का उदाहरण सामने है। सरकार के अनुसार 1985 से 31 जनवरी 2026 तक CAT में 9,88,738 मामले आए। इनमें 9,19,157 मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन 69,581 मामले तब भी लंबित थे। इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि न्यायाधिकरण को कार्यकारी से स्वतंत्र कर दिया गया।उसेकाम करने योग्यभी बनाना होगा।
नया बिल इसीलिए महत्वपूर्ण है कि यह न्यायाधिकरण सुधार को केवलकार्यकाल और नियुक्तिकरण की बहस से आगे ले जाने की कोशिश करता है। प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के पास नियुक्ति और निगरानीका संस्थागत ढांचाहोगा और उसके लिए एक स्थायी व्यावसायिक सचिवालय का भी प्रावधान बताया गया है। आयोग में न्यायिकऔर तकनीकी प्रतिनिधित्वका संतुलन रखा गया है।यह दिशा सही है।लेकिन यहाँ एक सावधानी भी जरूरी है।न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ न्यायिक एकाधिकार नहीं है।
अगर ट्रिब्यूनल को कार्यपालिका से निकालकर पूरी तरह न्यायिक नियंत्रण में दे दिया जाए, तो समस्या का एक सिरा सुलझाकर दूसरा पैदा हो सकता है। किसी संस्था को स्वतंत्र बनाने का मतलब यह नहीं कि उसे जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए। असल जरूरत दोनों से समान दूरी की है, न सरकार की जेब में ट्रिब्यूनल हो, न न्यायपालिका के प्रशासनिक विस्तार में बदल जाए।
यही कारण है कि नए ढांचे को उसके कागजी संरचना से ज्यादा उसके व्यवहार से परखा जाएगा।क्या रिक्तियां समय पर भरेंगी? क्या ट्रिब्यूनल के पास पर्याप्तस्टाफ़ होगा?क्या उसके पास अपने भवन और तकनीकी संसाधन होंगे?
क्या मामलों की आयुवार निगरानी होगी? क्या एक आदत बन गयी “स्थगन” पर नियंत्रण होगा?
क्या वादी को बार-बार दिल्ली या किसी दूसरे शहर की यात्रा करनी पड़ेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ट्रिब्यूनल का फैसला केवल इसलिए मजबूत माना जाएगा क्योंकि उसे देने वाली संस्था राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से पर्याप्त दूरी पर है? इन सवालों का उत्तर अभी बिल के पारित हो जाने से नहीं मिलता और यहीं इस पूरे प्रकरण की एक दूसरी विडंबना भी है।
जिस कानून का उद्देश्य संस्थागत गुणवत्ता और न्यायिक सुशासन को मजबूत करना है, उसे लोकसभा ने बिना बहस के पारित किया। उस समय विपक्ष नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर विरोध कर रहा था।
यहाँ सरकार और विपक्ष दोनों के लिए एक असुविधाजनक सवाल है। सरकार कह सकती है कि महत्वपूर्ण कानूनों को अनिश्चितकाल तक संसदीय व्यवधान की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। विपक्ष कह सकता है कि बिना पर्याप्त बहस के कानून पारित करना स्वयं संसद की भूमिका को कमजोर करता है। दोनों पक्षों में कुछ सच्चाई है। लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने कानून समय पर पारित हुए। यह भी देखना होगा कि कानून बनने से पहले उन पर कितनी गंभीरता से विचार हुआ। विशेषकर तब, जब कानून किसी ऐसी संस्था का निर्माण कर रहा हो जिसका संबंध सीधे नागरिक के न्याय के अधिकार से है।
न्यायाधिकरण सुधार का सबसे बड़ा परीक्षण अदालत में नहीं, प्रतीक्षा-कक्ष में होगा। वहाँ बैठा वह कर्मचारी जिसे प्रमोशन नहीं मिला। वह पेंशनर जिसकी पेंशन अटक गई। वह उद्यमी जिसका कर विवाद वर्षों से चल रहा है। वह कंपनी जिसका वाणिज्यिक दावा पूंजी को रोककर बैठा है। इन लोगों के लिए राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग तभी सफल होगा जब उन्हें यह महसूस हो कि व्यवस्था में एक ऐसा स्थान है जहाँ उनकी बात सुनी जाएगी और समय पर सुनी जाएगी।
भारत में न्यायिक सुधार की बहस अक्सर न्यायाधीशों की संख्या, रिक्तियां और अदालतों की संख्या तक सीमित हो जाती है। यह महत्वपूर्ण है, लेकिन पर्याप्त नहीं। हमें न्याय को एक सिस्टम की तरह देखना होगा। नियुक्ति से लेकर बुनियादी ढांचे तक। केस फाइलिंग से लेकर अंतिम आदेश तक। टेक्नोलॉजी से लेकर जवाबदेही तकऔर सबसे ऊपर नागरिक के विश्वास तक।
न्यायाधिकरण की स्वतंत्रता कोई अमूर्त संवैधानिक विलासिता abstract constitutional luxury नहीं है। यह आर्थिक दक्षता से भी जुड़ी है। व्यापार में विवाद वर्षों तक अटका रहे तो पूंजीफंसती है। कर्मचारी का सेवा विवाद लंबा चले तो उसका कॅरिअर प्रभावित होता है। पेंशन विवाद लंबा चले तो किसी बुजुर्ग की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित होती है।
इस अर्थ में न्याय की गति स्वयं में एक आर्थिक बुनियादी ढांचा है। भारत जब अपनी अधोसंरचना विकास में एक्सप्रेसवे और फ्रेटकॉरिडोर बना रहा है, तब उसे न्यायप्रणाली में भी ऐसे संस्थागत गलियारे बनाने होंगे जहाँ मामला एक काउंटर से दूसरे काउंटर के बीच वर्षों तक न भटके।न्यायाधिकरण सुधार विधेयक उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन किसी कानून की असली सफलता इस बात से तय नहीं होती कि वह सुप्रीमकोर्ट में टिक गया या संसद में पारित हो गया। उसकी सफलता तब होगी जब नागरिक को तारीख की पर्ची देखते हुए यह न सोचना पड़े“अगली तारीख कब है?”बल्कि उसे पहली बार यह भरोसा हो कि“अब मेरी बात सचमुच सुनी जाएगी।”
(रामपुर, जिला जबलपुर, मध्य प्रदेश)





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