सैयां भए कोतवाल तो अब डर काहे का...!

- ललिता जोशी  
सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का ये सुनते-सुनते बड़े हो गए लेकिन कभी इससे बावस्ता नहीं हुए थे । माँ अक्सर कहती थी रसूख वाले लोगों और पुलिस वालों से न दोस्ती अच्छी  न ही दुश्मनी । सीधा -सादा जीवन जीने वाले हमें इन सब से क्या लेना-देना । अपना काम ईमानदारी से करो और शांति से रहो । वो कहते हैं न ज़िंदगी जो दिखाये वो कम ही है चाहे वो अच्छा हो या बुरा । इस कहावत को मूर्त रूप में देखा और भोगा भी । अक्सर कार्यालयों में एमटीएस से लेकर उच्च पद पर विराजमान अधिकारी बड़ी ही चौड़ में फिरते हैं । चौड़ में फिरने वाले वर्ग विशेष से कार्यालय के सभी लोग संकोच रखते हैं क्योंकि पता नहीं बड़े साहब के पास उनके मुंह लगे नमक -मिर्च लगा कर क्या ही बक कर चले आए। शामत तो उसकी आएगी जो कार्यालय में अनाथ होता है । तब माँ भी याद आई और ये लोकोक्ति भी कि  सैयां कोतवाल तो डर काहे का।
ये तो कार्यालय के सैयां हैं जो केवल कार्यालय के दायरे तक सीमित रहते हैं । इनके मुंह लगे अपनी खुन्नस  निकालने के लिए और अपना काम करवाने के लिए उस किसी को भी शिकार बना लेते हैं जिसकी पहुंच ऊपर तक नहीं होती । इनकी  चौड़ तो बढ़ जाती है मगर इनसे पीड़ित की छवि तो ऐसी बना दी जाती है जैसे वो कामचोर और मुंहजोर भी है । असल में तो चौड़ रखने वाला वर्ग असल में कामचोर और मुंहज़ोर होता है । इसीलिए तो इस वर्ग के सैयां या सजनी कोतवाल हैं कार्यालय के प्रधान । तो वो सब पर अपना रोब -दाब रखते हैं ।

अरे भई अब चलते हैं असल के कोतवाल के दर्शन के लिए । अब तक हम अपने घर में शांति से रह थे । ज़िंदगी मजे में चल रही थी । हमारे मजे को ग्रहण लगने वाला था हम इस बात से बेखबर थे क्योंकि ज़िंदगी के ग्रहण को बताने के लिए कोई खगोलशास्त्री नहीं है। हमारे पड़ोस में एक बहुत बड़े कोतवाल साहब का परिवार रहने के लिए आने वाला था। पास -पड़ोस बहुत ही खुश था कि एक प्रभावशाली परिवार रहने आ रहा  है। तो कभी किसी मदद की आवश्यकता होगी तो वो मिल जाएगी । बड़ी जल्दी ही ये सब एक भ्रम साबित हुआ । मैडम जी के सुहाग बड़े अधिकारी जी हैं। मैडम जी के पति उन्हें उनके पुण्य के फलस्वरूप रूप में प्राप्त हुए हैं । इसीलिए तो इतना प्रगाढ़ संबंध है पति -पत्नी का । ऐसा संबंध कि एक दूसरे में कोई कमी नज़र नहीं आती है साहब को मैडम में ।

साहब की मैडम की एक खूबी है कि अगर उनका मन और दिल किसी चीज पर आ जाए तो वो उसे छिन कर ही मानती हैं या फिर थोड़ी सभ्य भाषा में कहें कि मैडम जी बाल हठ और स्त्री हठ का अद्भुत और अकल्पनीय मिश्रण हैं । जैसे की किसी जिद्दी को कोई खिलौना चाहे वो किसी के घर में दीवार पर सजी हुई पेंटिंग हो या प्लांटर पसंद आ गया तो उन्हें वो चाहिए ही चाहिए । उसके लिए उन्हें कोई भी हथकंडा अपनाना पड़े वो अपनाती हैं ।अगर किसी से चिढ़ लग जाए तो उसे फिर या हटवा कर दम लेंगी या तुड़वा कर मानेगी । वैसे तो उनका अपना  घर तो अपना है ही मगर अगल -बगल वाले घर की किसी चीज से चिढ़ हो तो उसे नगर निगम से तुड़वा देंगी या मकान मालिक को धौंस पट्टी दे डालती हैं ।

आम आदमी की शिकायत पर तो पुलिस भी गोल और नगर निगम डांवा डोल । मैडम के सैयां तो हैं ही पुलिस वाले । अरे भई इनको कौन मना करेगा ? जिसने मना किया तो समझ लो वो आगे और मैडम के प्यादे ओह मैडम के नहीं कोतवाल साहब के प्यादे उसके पीछे -पीछे ऐसे पड़ते हैं जैसे कि ततैयों का झुंड पीछे लग गया हो । बेचारा पीड़ित करे तो क्या करे । सत्यमेव जयते की संस्कृति पर जिस की लाठी उसकी भैंस वाली कहावत विजयी हो जाती है । मैडम के कोतवाल पति तो अदृश्य होकर मैडम की सहायता करते हैं । कोतवाल के साहब के कनेक्शन इतने तगड़े कि पूछो मत । प्रत्येक सरकारी महकमे में उनकी पहूंच इतनी तगड़ी है कि जिस किसी को आदेश दे दें वही सिर के बल आदेश मानने के लिए खड़ा हो जाता है । बेचारे अड़ोसी -पड़ोसी अब ऐसे रह रहे हैं जैसे कि वो कोई अपराधी हैं और मैडम कानून मानने वाली नागरिक हैं ।
सैयां भये कोतवाल को साक्षात मूर्त रूप में देख अब तो लगता है कि पास -पड़ोस में आम नागरिक रहे तो अच्छा है ताकि वो सांस तो आराम से ले सकें ।

अरे भई कोतवाल और कोतवाल की सजनी से उचित दूरी बना कर रखेँ और शांतिपूर्वक जीवन जिये । अगर आपने उनकी शिकायत किसी सरकारी पोर्टल पर कर दी तो समझ लो कि आपकी शिकायत का कोई निवारण तो होगा नहीं लेकिन आपकी शामत आपके घर खुद ही चल कर आ जाएगी अतिथि की  तरह  । अब आप खुद ही समझो कि जाएँ तो जाएँ कहाँ ?लगता है समाज के सभी आम लोगों को इस लोकोक्ति से रूबरू होना ही पड़ा होगा । तभी तो किसी शायर ने इस पर ठीक ही कहा है---
ताकत के नशे में हर उसूल तोड़ देते हैं,
सैयां भये कोतवाल, फिर डर यहाँ किसको है ?
न कानून का डर है, न खौफ जमाने का,
अंधेर है ये कैसा दौर निभाने का।
हर जुर्म यहाँ माफ हो जाता है पल में,
जब सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का।।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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